शास्त्रीय, वास्तुशास्त्रीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समग्र विश्लेषण - आचार्य ऋतुराज दुबे १. ब्रह्मांडीय ज्यामिति और दिग्पालों की संकल्पना ब्रह्मांड असीम, अनंत और निरंतर विस्तारशील है - किंतु मानव संज्ञान और भौतिक अस्तित्व के मध्य सामंजस्य स्थापित करने के लिए एक व्यवस्थित ढाँचे की आवश्यकता सदा से रही है। प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपराओं में, विशेष रूप से हिंदू धर्म, जैन धर्म और वज्रयान बौद्ध धर्म में, अंतरिक्ष और दिशाओं के इस विभाजन को अत्यंत गूढ़, दार्शनिक और वैज्ञानिक रूप से संहिताबद्ध किया गया है। 'दिग्पाल' शब्द संस्कृत के दो मूल शब्दों 'दिक्' (दिशा) और 'पाल' (रक्षक, प्रशासक या पालक) से मिलकर बना है। इसका शाब्दिक और दार्शनिक अर्थ है - भौतिक और आध्यात्मिक अंतरिक्ष के वे रक्षक जो ब्रह्मांडीय संतुलन (Cosmic Order) को बनाए रखते हैं। शास्त्रीय ब्रह्मांड विज्ञान के अनुसार, मुख्य रूप से आठ दिशाएँ होती हैं - चार मुख्य और चार मध्यवर्ती - जिनके रक्षकों को 'अष्ट-दिक्पाल' कहा जाता है। जब इन आठ दिशाओं के त्रि-आयामी (3D) स्वरूप को ऊर्ध्व (Zenith) और अधो (Nadir) ...
The School of Paravigyan explores consciousness, tantra, fear, inner transformation, spiritual psychology, and inner sciences through direct experience, lived insight, and practical understanding.