आज के युवा बहुत सीधे और ज़रूरी सवाल पूछते हैं - 'भगवान ने दुनिया बनाई, तो भगवान को किसने बनाया?' या फिर 'बिग बैंग से पहले क्या था?' या 'हिंदू धर्म कहता है कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि बनाई, लेकिन विज्ञान कुछ और ही बताता है - इनमें से सच कौन है?' ये प्रश्न बेकार नहीं हैं। ये प्रश्न ही मनुष्य को पशु से अलग करते हैं। और सबसे बड़ी बात - हमारे वेद और दर्शन ने हज़ारों साल पहले इन्हीं प्रश्नों से जूझना शुरू किया था। आज हम उसी यात्रा में साथी बनेंगे।
पहले यह समझ लेते हैं कि हिंदू धर्म या सनातन परंपरा में सृष्टि की उत्पत्ति के बारे में एक नहीं, अनेक विचार हैं। यह विविधता कमज़ोरी नहीं, बल्कि इस परंपरा की ताकत है। हर दार्शनिक परंपरा ने सत्य के एक अलग पहलू को पकड़ने की कोशिश की है - जैसे हाथी को अंधे लोग अलग-अलग तरफ से छूते हैं और हर कोई सच बोलता है, पर पूरा हाथी किसी एक के हाथ नहीं आता।
सबसे पहला प्रश्न: सृष्टि से पहले क्या था?
ऋग्वेद में एक बहुत प्रसिद्ध सूक्त है जिसे 'नासदीय सूक्त' कहते हैं। यह मात्र सात ऋचाओं का एक छोटा-सा सूक्त है, लेकिन इसमें जो प्रश्न पूछे गए हैं, वे आज के सबसे आधुनिक वैज्ञानिकों को भी चौंका देते हैं। इस सूक्त के ऋषि कहते हैं - 'सृष्टि से पहले न 'सत्' था, न 'असत्'।' अर्थात्, न तो 'कुछ था' और न 'कुछ नहीं था।'
यह सुनकर पहले अजीब लगता है। हम सोचते हैं - भाई, या तो कुछ होगा या कुछ नहीं होगा, बीच में क्या? लेकिन जब आधुनिक क्वांटम फिजिक्स कहती है कि शून्य भी पूरी तरह शून्य नहीं होता, उसमें भी ऊर्जा की हलचल होती रहती है - तो वैदिक ऋषि का यह कथन अचानक बहुत वैज्ञानिक लगने लगता है। सृष्टि से पहले न अंधकार था, न प्रकाश, न मृत्यु, न अमरता। केवल वह 'एक' था - जो बिना वायु के भी अपनी ही शक्ति से श्वास ले रहा था। इसे ऋषियों ने 'स्वधा' कहा - अर्थात् जिसकी ऊर्जा उसके अपने भीतर से ही आती है।
इस सूक्त की सबसे क्रांतिकारी बात इसका अंत है। अंत में ऋषि कहते हैं - 'शायद इस सृष्टि को उसके रचनाकार ने ही बनाया हो, और शायद नहीं भी बनाया हो। वह जो स्वर्ग के उस पार बैठा है, वही जानता है - या शायद वह भी नहीं जानता।' यह वाक्य पढ़कर आप हैरान हो जाएंगे - क्योंकि यह किसी कट्टर धार्मिक ग्रंथ का नहीं, बल्कि एक बेहद वैज्ञानिक मन का वक्तव्य है। जो जानता है वह दावा नहीं करता, और जो दावा करता है वह सब नहीं जानता - यही भारतीय दर्शन की असली विनम्रता है।
वेद की तीन तस्वीरें: तीन अलग-अलग नज़रिए
ऋग्वेद में सृष्टि की उत्पत्ति को समझाने के लिए तीन मुख्य तस्वीरें मिलती हैं। पहली तस्वीर नासदीय सूक्त की है जिसकी बात हमने ऊपर की। दूसरी तस्वीर 'हिरण्यगर्भ सूक्त' की है। 'हिरण्य' का मतलब है सोना या प्रकाश, और 'गर्भ' का मतलब है उत्पत्ति का स्रोत या बीज। ऋषि कहते हैं कि सृष्टि के आरंभ में सर्वत्र जल था। उस जल में एक प्रकाशमान बीज उत्पन्न हुआ जिससे समस्त ब्रह्मांड का विस्तार हुआ।
अब इसकी तुलना आधुनिक विज्ञान के 'बिग बैंग' सिद्धांत से करें। विज्ञान कहता है कि लगभग तेरह अरब वर्ष पहले एक अकल्पनीय रूप से सघन और ऊर्जावान बिंदु से ब्रह्मांड का विस्फोट हुआ और वह फैलता चला गया। वैदिक 'हिरण्यगर्भ' - एक सघन, प्रदीप्त, ऊर्जा से भरपूर बीज - और वैज्ञानिक 'सिंगुलैरिटी' के बीच की समानता देखकर कोई भी चकित हो जाता है। यह संयोग हो सकता है, लेकिन हमारे ऋषियों की सोच की गहराई का अनुमान तो मिलता ही है।
तीसरी तस्वीर 'पुरुष सूक्त' की है। यहाँ ऋषि कल्पना करते हैं कि ब्रह्मांड एक 'विराट पुरुष' है - जिसके हज़ारों सिर, हज़ारों आँखें, हज़ारों पैर हैं। इस विराट पुरुष के यज्ञ से - यानी उसके स्वयं को अर्पित करने से - सृष्टि का जन्म हुआ। उसके मन से चंद्रमा बना, आँखों से सूर्य, मुख से अग्नि और इंद्र, प्राणों से वायु, नाभि से अंतरिक्ष, सिर से स्वर्ग और पैरों से पृथ्वी। इस रूपक का गहरा अर्थ यह है कि पूरा ब्रह्मांड एक ही चेतना का विस्तार है। जिस तरह शरीर के हर अंग में एक ही प्राण धड़कता है, उसी तरह ब्रह्मांड के हर कण में एक ही दिव्य ऊर्जा स्पंदित है।
छः दर्शन, छः नज़रिए: भारत का बौद्धिक वैभव
वेदों के बाद भारत में छः महान दार्शनिक परंपराएं विकसित हुईं जिन्हें 'षड्दर्शन' कहते हैं - सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत। इन सबने सृष्टि की उत्पत्ति पर अलग-अलग तर्क प्रस्तुत किए। इनके बीच कभी-कभी ऐसे वाद-विवाद भी होते थे जो आज के 'डिबेट शो' से कहीं ज़्यादा तीखे और तर्कशास्त्रीय थे।
महर्षि कपिल द्वारा प्रवर्तित सांख्य दर्शन सबसे पहले और सबसे तार्किक उत्तर देता है। सांख्य का मूल सिद्धांत है 'सत्कार्यवाद' - अर्थात् जो चीज़ पैदा होती है, वह पहले से कहीं न कहीं मौजूद थी। जैसे तेल तिल में पहले से छिपा होता है, दही दूध में पहले से संभावित होती है - उसी तरह यह सारी सृष्टि उसके कारण में पहले से मौजूद थी, बस अव्यक्त थी।
सांख्य के अनुसार सृष्टि की जड़ में दो तत्व हैं - 'प्रकृति' और 'पुरुष'। प्रकृति वह मूल ऊर्जा है जो तीन गुणों - सत्व (प्रकाश, ज्ञान), रजस (क्रिया, ऊर्जा) और तमस (जड़ता, भार) - के संतुलन में रहती है। पुरुष यानी चेतना - शुद्ध, निर्लिप्त और साक्षी। जब पुरुष का सान्निध्य प्रकृति से होता है, तो तीनों गुणों का संतुलन टूटता है और विकास की प्रक्रिया शुरू होती है। पहले महत् या बुद्धि उत्पन्न होती है, फिर अहंकार, फिर मन और इंद्रियाँ, फिर पंच तन्मात्राएं, और अंत में पाँच महाभूत - आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। यह पूरी क्रमिक उत्पत्ति की प्रक्रिया आज के विकासवाद (Evolution) की याद दिलाती है।
सांख्य की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह ईश्वर को सृष्टि का निर्माता नहीं मानता। वह कहता है कि प्रकृति और पुरुष के संयोग से सृष्टि स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। इसीलिए इसे 'अनीश्वरवादी सांख्य' भी कहते हैं। यह सुनकर कुछ लोग चौंकते हैं - एक हिंदू दर्शन जो ईश्वर को नहीं मानता! लेकिन यही भारतीय परंपरा की उदारता है कि उसने इस मत को भी वैदिक दर्शन के भीतर सम्मान दिया।
वैशेषिक दर्शन एक बिल्कुल अलग रास्ते से चलता है। यह कहता है कि यह दृश्यमान जगत परमाणुओं के संयोग से बना है। पृथ्वी, जल, तेज और वायु - इन चारों के परमाणु शाश्वत हैं। दो परमाणुओं के मिलने से 'द्वयणुक' बनता है, तीन द्वयणुकों से 'त्रयणुक' बनता है जो दिखने लगता है - और इसी क्रम में यह पूरी दृश्य सृष्टि अस्तित्व में आती है। यह सिद्धांत आज के परमाणु विज्ञान से लगभग दो हज़ार साल पहले का है!
मीमांसा दर्शन एक और चौंकाने वाला मत रखता है। आचार्य जैमिनी कहते हैं - सृष्टि का न आदि है, न अंत। यह जगत सनातन है, इसे किसी ने बनाया नहीं। जो है वह हमेशा से था और हमेशा रहेगा। रूप और आकार बदलते रहते हैं, लेकिन मूल तत्व नष्ट नहीं होता। यह आधुनिक ऊर्जा-संरक्षण के नियम (Law of Conservation of Energy) से कितना मेल खाता है - 'ऊर्जा न बनती है, न नष्ट होती है, केवल रूप बदलती है।'
वेदांत का उत्तर: सबसे गहरी और सबसे सुंदर व्याख्या
अब हम आते हैं उस दर्शन पर जिसने सृष्टि के प्रश्न का सबसे काव्यात्मक और गहरा उत्तर दिया - वेदांत। वेदांत उपनिषदों का सार है और इसमें शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य जैसे महान आचार्यों ने अपनी-अपनी व्याख्याएं दीं।
आदि शंकराचार्य का उत्तर है - 'ब्रह्म सत्यं, जगत् मिथ्या।' अर्थात् एकमात्र परम सत्य ब्रह्म है और यह दृश्यमान जगत उसकी 'माया' के कारण हमें दिखता है। शंकर एक सुंदर उदाहरण देते हैं - रात के अंधेरे में पड़ी रस्सी को हम सर्प समझ लेते हैं। रस्सी सर्प नहीं बनी, लेकिन अज्ञान के कारण हमें सर्प दिखा। उसी तरह ब्रह्म जगत में नहीं बदला, लेकिन अविद्या के कारण हमें यह रंगबिरंगी सृष्टि दिखती है। जब ज्ञान की रोशनी होती है, तो केवल ब्रह्म ही शेष रहता है।
इस सिद्धांत को 'विवर्तवाद' कहते हैं - जहाँ कारण बदले बिना कार्य के रूप में दिखता है। यह देखने में बहुत सरल लगता है, लेकिन इसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। अगर जगत माया है, तो इसका मतलब यह नहीं कि यह झूठ है। शंकर कहते हैं - व्यावहारिक जीवन में जगत सत्य है, लेकिन परम सत्य की दृष्टि से यह सीमित है। जैसे स्वप्न में दुःख बहुत वास्तविक लगता है, लेकिन जागने पर पता चलता है वह स्वप्न था।
रामानुजाचार्य ने शंकर से असहमति जताई। उन्होंने पूछा - अगर जगत माया है, तो जो जगत को माया मानता है वह 'मैं' कौन हूँ? वह भी तो जगत का ही हिस्सा है। रामानुज ने 'परिणामवाद' का सिद्धांत दिया - ब्रह्म वास्तव में जगत के रूप में परिवर्तित होता है। जैसे दूध वास्तव में दही बन जाता है। ब्रह्म सगुण है, वह केवल निर्गुण निराकार नहीं। जीव और जगत ब्रह्म के शरीर हैं। प्रलय काल में सब कुछ ब्रह्म में सिमट जाता है और सृष्टि काल में वही फिर प्रकट हो जाता है। इस दृष्टि में जगत मिथ्या नहीं, बल्कि ब्रह्म का सत्य विस्तार है।
मध्वाचार्य ने तीसरा मत दिया जिसे 'द्वैतवाद' कहते हैं। वे कहते हैं - ईश्वर, जीव और जगत तीनों अलग-अलग हैं और सदा भिन्न रहेंगे। ईश्वर - विष्णु - सर्वोच्च है, जीव उन पर निर्भर है और जगत उनके नियंत्रण में। यह एकदम स्पष्ट और सरल तर्क है जो आम भक्त को समझ में आता है - भगवान अलग हैं, हम अलग हैं, और इस दुनिया में हमें भगवान की शरण में रहना है।
वल्लभाचार्य का 'शुद्धाद्वैत' और भी सुंदर है। वे कहते हैं - कृष्ण ही परम ब्रह्म हैं। यह जगत उन्हीं का अंश है, उनसे अलग नहीं। ब्रह्म अपनी इच्छा से स्वयं को अनेक रूपों में प्रकट करता है - नदियाँ, पहाड़, फूल, पत्ते, मनुष्य, पशु - सब कुछ उसी की लीला है। और यह लीला इसलिए नहीं कि उसे कुछ चाहिए, बल्कि इसलिए कि आनंद उसका स्वभाव है।
उपनिषदों के सरल रूपक: जो दिल तक पहुँचते हैं
दर्शन की इन जटिल चर्चाओं को उपनिषदों ने बहुत सरल और प्यारे रूपकों में समझाया है। मुण्डकोपनिषद् में एक दृश्य है जो एक बार पढ़ने के बाद कभी नहीं भूलता - एक मकड़ी अपने ही भीतर से धागा निकालकर जाल बनाती है, और फिर उसी जाल को अपने में वापस समेट लेती है। उसी तरह ब्रह्म अपने भीतर से यह सारा ब्रह्मांड प्रकट करता है और अंत में उसे अपने में वापस समेट लेता है। यह सिर्फ सृष्टि का सिद्धांत नहीं है, यह हमें यह भी बताता है कि ब्रह्म इस सृष्टि की सामग्री भी है और बनाने वाला भी - ठीक वैसे जैसे मकड़ी ही धागा है और मकड़ी ही बुनकर भी।
एक और उदाहरण देखें - जिस तरह प्रज्वलित अग्नि से हज़ारों चिनगारियाँ निकलती हैं जो अग्नि जैसी ही होती हैं, उसी तरह ब्रह्म से जीवात्माएं उत्पन्न होती हैं जो ब्रह्म की ही प्रकृति की होती हैं। या जिस तरह पृथ्वी से अनगिनत वनस्पतियाँ और औषधियाँ उगती हैं बिना पृथ्वी को कुछ खर्च किए - वैसे ही ब्रह्म से यह सृष्टि उगती है बिना ब्रह्म के कम हुए। ये उदाहरण दार्शनिक नहीं, काव्यात्मक हैं - और कभी-कभी काव्य वह बात कह देता है जो तर्क नहीं कह पाता।
विज्ञान और वेद: दुश्मन नहीं, यात्री-साथी
आज के युवाओं में अक्सर यह भ्रम रहता है कि विज्ञान और धर्म एक-दूसरे के विरोधी हैं। लेकिन ध्यान से देखें तो भारतीय वैदिक परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच एक अद्भुत संवाद है - विरोध नहीं।
आधुनिक विज्ञान का 'बिग बैंग' सिद्धांत कहता है - लगभग तेरह अरब वर्ष पहले एक अत्यंत सघन बिंदु से ब्रह्मांड का विस्फोट हुआ और वह आज भी फैल रहा है। लेकिन वैज्ञानिक यह नहीं बता पाते कि बिग बैंग से पहले क्या था। यहीं आकर वे रुक जाते हैं। नासदीय सूक्त का ऋषि भी यहीं रुकता है - और वह इस अज्ञान को स्वीकार करता है, लेकिन प्रश्न पूछना नहीं छोड़ता।
विज्ञान में अब 'बिग बाउंस' (Big Bounce) का विचार प्रबल हो रहा है जो कहता है कि ब्रह्मांड का विस्तार और संकुचन एक चक्र में चलता है। एक महाविस्फोट होता है, ब्रह्मांड फैलता है, फिर सिकुड़ता है, और फिर नया महाविस्फोट। भारतीय दर्शन में यही 'सृष्टि और प्रलय का चक्र' हज़ारों साल पहले से स्वीकृत है। काल की यह चक्रीय अवधारणा पश्चिमी रैखिक (linear) समय-दृष्टि से बिल्कुल अलग है।
क्वांटम फिजिक्स कहती है कि 'शून्य' भी पूरी तरह खाली नहीं होता - उसमें कण और प्रतिकण अचानक प्रकट होते हैं और विलीन हो जाते हैं। इसे 'क्वांटम फ्लक्चुएशन' कहते हैं। नासदीय सूक्त का 'काम' - वह प्रथम इच्छा जो शून्य में हलचल पैदा करती है - क्या इसी की ओर संकेत नहीं करती? इस समानता को केवल संयोग कहकर नकारना बौद्धिक आलस्य होगा।
लेकिन एक महत्वपूर्ण बात भी समझनी चाहिए। विज्ञान और वेद दोनों 'सत्य की खोज' करते हैं, लेकिन उनके प्रश्न अलग हैं। विज्ञान पूछता है - 'यह कैसे हुआ?' वेद और दर्शन पूछते हैं - 'यह क्यों हुआ? इसका प्रयोजन क्या है? इसमें मेरा क्या स्थान है?' दोनों की ज़रूरत है। केवल 'कैसे' जानने से जीवन नहीं जिया जाता - 'क्यों' का उत्तर भी चाहिए।
शाक्त दर्शन: जब माँ ही सृष्टि है, माँ ही सृष्टिकर्ता है
जब हम षड्दर्शनों और वेदांत के आचार्यों की बात करते हैं, तो एक महान परंपरा अक्सर छूट जाती है जो सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में सबसे समग्र, सबसे जीवंत और सबसे साहसी उत्तर देती है - और वह है शाक्त दर्शन। शाक्त परंपरा केवल एक पूजा-पद्धति नहीं है। यह एक पूर्ण दार्शनिक दृष्टि है जो यह घोषणा करती है कि इस सृष्टि का मूल आधार न कोई पुरुष तत्व है, न कोई निर्गुण निराकार ब्रह्म - बल्कि वह परम शक्ति है जिसे हम माँ कहते हैं, जिसे शास्त्र ‘आद्याशक्ति’, ‘परा’, ‘महाशक्ति’ और ‘चिच्छक्ति’ के नाम से जानते हैं।
शाक्त दर्शन का सबसे प्रमाणिक और प्राचीन ग्रंथ है देवी भागवत महापुराण। इसके तृतीय स्कंध में एक बहुत महत्वपूर्ण संवाद है जहाँ महर्षि नारद ब्रह्मा जी से पूछते हैं - ‘इस सृष्टि का मूल कारण क्या है?’ और ब्रह्मा जी उत्तर देते हैं कि इस सृष्टि का मूल कारण वह आद्याशक्ति है जो सत्-चित्-आनंद स्वरूपिणी है और जिसकी इच्छा से ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश का अस्तित्व है। यह एक क्रांतिकारी वक्तव्य है। त्रिदेव - जिनके बारे में हम सुनते आए हैं कि वे ही सृष्टि के रचनाकार हैं - वे भी उस आद्याशक्ति की इच्छा के अधीन हैं। सृष्टि का वास्तविक स्रोत वह परम शक्ति है।
“सैव विश्वस्य जननी सैव विश्वस्य पालिका। सैव विश्वस्य संहर्त्री सैव विश्वं सनातनी।”
- देवी भागवत महापुराण, तृतीय स्कंध
अर्थात् - ‘वही इस विश्व की जननी है, वही विश्व की पालनकर्ता है, वही संहारकर्ता है और वही सनातन विश्वस्वरूपा है।’ यहाँ उत्पत्ति, पालन और संहार तीनों एक ही शक्ति में समाहित हैं। यह वही शाक्त दर्शन की मूल स्थापना है।
दूसरा महत्वपूर्ण शाक्त प्रमाण आता है मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत ‘देवी माहात्म्य’ (दुर्गा सप्तशती) से। इसके प्रथम चरित्र (मधु-कैटभ वध) के आरंभ में ऋषि मेधा महाराज सुरथ को देवी की प्रकृति समझाते हुए कहते हैं -
“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।”
- देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती), अध्याय 5
‘जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान हैं - उन्हें बार-बार नमस्कार।’ यह श्लोक केवल स्तुति नहीं है, यह एक दार्शनिक घोषणा है। शाक्त दर्शन कहता है कि वह परम शक्ति किसी मंदिर या आकाश में दूर नहीं बैठी - वह हर जीव के भीतर, हर कण में, हर स्पंदन में शक्ति के रूप में मौजूद है। सृष्टि बाहर नहीं हुई - वह उसी माँ के भीतर से हुई और उसी के भीतर घटित हो रही है।
शाक्त दर्शन का तीसरा और सबसे गहरा प्रमाण आता है कश्मीर शैव-शाक्त परंपरा के महान ग्रंथ ‘देवीनामविलास’ और ‘ललितासहस्रनाम’ से। ललितासहस्रनाम में देवी के एक नाम पर ध्यान दीजिए - ‘विमर्शरूपिणी’। यहाँ ‘विमर्श’ का अर्थ है चेतना का स्व-बोध, अपने-आप की पहचान। कश्मीर शैव दर्शन कहता है कि ‘प्रकाश’ (शिव - शुद्ध चेतना) और ‘विमर्श’ (शक्ति - चेतना का स्व-बोध) के मिलन से सृष्टि की उत्पत्ति होती है। जहाँ केवल प्रकाश हो और विमर्श न हो, वहाँ चेतना अपने-आप को नहीं जानती - वह जड़ जैसी हो जाती है। शक्ति वह है जो शिव की चेतना को स्पंदित करती है, उसे जागरूक करती है, और इसी जागरण से सृष्टि का प्रादुर्भाव होता है।
“शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्। न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि।”
- सौन्दर्यलहरी, श्लोक 1 (आद्यशंकराचार्य / शाक्त परंपरा)
‘शिव शक्ति से युक्त हों तो सृष्टि करने में समर्थ होते हैं, अन्यथा वे स्पंदित होने में भी असमर्थ हैं।’ यह श्लोक सौन्दर्यलहरी का पहला ही श्लोक है - और यह पूरे शाक्त दर्शन का सार है। शिव अगर शक्ति-रहित हों, तो वे ‘शव’ मात्र हैं। जो चेतना स्पंदित है, जो जीवित है, जो सृजन कर सकती है - वह शक्ति के कारण है। यही कारण है कि तंत्रशास्त्र में कहा गया है - ‘शक्तिः शिवस्य देहार्धम्’ - शक्ति शिव के शरीर का आधा भाग है। अर्धनारीश्वर की यही दार्शनिक पृष्ठभूमि है।
अब शाक्त दर्शन की सृष्टि-प्रक्रिया को और गहराई से समझते हैं। तंत्र के महान ग्रंथ ‘योनितंत्र’ और ‘कामाख्यातंत्र’ में कहा गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति का मूल रहस्य ‘इच्छा-शक्ति’, ‘ज्ञान-शक्ति’ और ‘क्रिया-शक्ति’ के त्रिकोण में छिपा है। पहले परम माँ की ‘इच्छा’ जागती है - ‘एकोऽहं बहुस्याम्’ अर्थात् मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ। यह ठीक वही है जो छान्दोग्य उपनिषद में ब्रह्म की इच्छा के रूप में वर्णित है, लेकिन शाक्त दर्शन इस इच्छा को स्त्री-तत्व - शक्ति - के रूप में देखता है। इच्छा के बाद ‘ज्ञान’ उत्पन्न होता है - कि मैं क्या बनूँगी, कैसे बनूँगी। और फिर ‘क्रिया’ - वह सृजन जो दृश्यमान जगत बन जाता है।
देवी भागवत के सप्तम स्कंध में एक बहुत महत्वपूर्ण प्रसंग है जहाँ देवी स्वयं अपने स्वरूप का वर्णन करती हैं। वे कहती हैं - ‘मैं ही ब्रह्म हूँ, मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही रुद्र हूँ। मैं ही सूर्य, चंद्र और अग्नि हूँ। इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, वह सब मैं ही हूँ।’ यह केवल अहंकार नहीं है - यह अद्वैत का शाक्त संस्करण है। जहाँ शंकराचार्य का अद्वैत कहता है ‘अहं ब्रह्मास्मि’ - मैं ब्रह्म हूँ, वहाँ शाक्त अद्वैत कहता है ‘सर्वं खल्विदं शक्तिः’ - यह सब कुछ शक्ति ही है।
“अहमेव परं ब्रह्म अहमेव परं पदम्। अहमेव परा शक्तिः अहमेव परं तपः।”
- देवी भागवत महापुराण, सप्तम स्कंध, अध्याय 33
‘मैं ही परम ब्रह्म हूँ, मैं ही परम पद हूँ, मैं ही परम शक्ति हूँ, मैं ही परम तप हूँ।’ इस वक्तव्य में जो विशेषता है वह यह है कि यहाँ शक्ति अपने-आप को किसी की पत्नी, किसी की सहचरी, किसी की माया या किसी के अधीन नहीं कह रही - वह स्वयं परम ब्रह्म है। यह शाक्त दर्शन का सबसे साहसी दार्शनिक कथन है।
तंत्रशास्त्र के एक अत्यंत प्रमाणिक ग्रंथ ‘महानिर्वाणतंत्र’ में शिव स्वयं पार्वती को बताते हैं कि इस सृष्टि का आधार ‘आनंद’ है। ब्रह्म ने सृष्टि क्यों की? इसलिए नहीं कि उसे कोई कमी थी। इसलिए नहीं कि उसे कुछ चाहिए था। सृष्टि हुई क्योंकि आनंद का स्वभाव है प्रकट होना, फैलना, बाँटना। जैसे प्रेम जब अपने चरम पर होता है तो वह एक के साथ नहीं रुकता - वह सबको समेटना चाहता है। परम माँ का आनंद इतना असीम था कि वह अनेक रूपों में प्रकट हो गया - और यही इस सृष्टि का रहस्य है। महानिर्वाणतंत्र में कहा गया है -
“आनंदाद्धेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनंदेन जातानि जीवन्ति। आनंदं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।”
- तैत्तिरीय उपनिषद् 3.6.1 (शाक्त तंत्र में उद्धृत)
‘आनंद से ही ये सभी प्राणी उत्पन्न हुए हैं, आनंद से ही जीते हैं और अंत में आनंद में ही विलीन हो जाते हैं।’ यह वचन उपनिषद् का है, लेकिन शाक्त तंत्र इसे अपनी साधना का केंद्रबिंदु मानता है। तंत्र में इसी आनंद को ‘परमानंद’ या ‘महासुख’ कहा गया है - और यही माँ का स्वरूप है जिससे सृष्टि जन्मती है।
शाक्त दर्शन का सबसे आधुनिक और वैज्ञानिक पहलू यह है कि वह सृष्टि को ‘ऊर्जा’ के रूप में देखता है। भौतिक विज्ञान की प्रसिद्ध समीकरण E=mc² कहती है कि द्रव्यमान और ऊर्जा एक ही चीज़ के दो रूप हैं। शाक्त दर्शन हज़ारों साल पहले यही कह रहा था - यह दृश्यमान जगत जो ठोस और भारी लगता है, वह भी उसी एक परम ऊर्जा – परम शक्ति – का घनीभूत रूप है। ‘शक्तिः’ और ‘Energy’ - दोनों एक ही सत्य के दो नाम हैं।
इस प्रकार शाक्त दर्शन सृष्टि के प्रश्न का जो उत्तर देता है वह अन्य दर्शनों से इस अर्थ में भिन्न है कि वह सृष्टि को न केवल एक दार्शनिक घटना मानता है, बल्कि एक जीवंत, स्पंदनशील, आनंदमय प्रक्रिया मानता है - ठीक वैसे जैसे एक माँ का गर्भ से शिशु का जन्म। सृष्टि किसी की ‘बनाई’ नहीं है - वह परम माँ से ‘जन्मी’ है। और जो जन्म लेता है वह माँ से कभी अलग नहीं होता। यही शाक्त दर्शन का अंतिम और सबसे हृदयग्राही संदेश है।
तो आखिर सच क्या है?
यह प्रश्न बहुत स्वाभाविक है। इतने सारे मत सुनने के बाद कोई भी पूछेगा - 'ठीक है, इतने सारे सिद्धांत हैं, लेकिन सही कौन-सा है?'
भारतीय परंपरा का उत्तर बहुत विनम्र और साहसी है - ये सभी मत सत्य के अलग-अलग स्तरों को छूते हैं, ये एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। सांख्य का विकासवाद और वैशेषिक का परमाणुवाद भौतिक जगत को समझाता है। वेदांत का अद्वैत आत्मा और ब्रह्म की एकता को उजागर करता है। उपनिषदों के रूपक हमें उस सत्य की झलक देते हैं जो भाषा में नहीं आता।
एक अंधे आदमी के लिए हाथी का वर्णन वही करेगा जो उसे छू रहा है। जो सूँड पकड़ रहा है वह कहेगा - 'हाथी एक लंबी नली जैसा है।' जो पैर पकड़ रहा है वह कहेगा - 'हाथी एक खंभे जैसा है।' दोनों सच बोल रहे हैं, दोनों गलत भी हैं। हाथी इन दोनों वर्णनों से बड़ा है। उसी तरह ब्रह्मांड की सत्ता किसी एक दर्शन में पूरी तरह समाती नहीं।
इसीलिए भारतीय परंपरा ने यह कभी नहीं कहा कि 'केवल हमारा मत सही है।' यहाँ वाद-विवाद को प्रोत्साहन दिया गया, अलग-अलग मतों को सम्मान दिया गया, और यह माना गया कि सत्य की यात्रा में प्रश्न पूछना सबसे बड़ा धर्म है।
अंत में: सृष्टि को समझना क्यों ज़रूरी है?
कोई पूछ सकता है - 'यह सब जानकर क्या करेंगे? इससे नौकरी मिलेगी? पैसा आएगा?' यह प्रश्न भी उचित है। लेकिन सोचिए - अगर आप यह नहीं जानते कि आप कहाँ से आए, तो आप यह कैसे जानेंगे कि आप कहाँ जा रहे हैं? सृष्टि की उत्पत्ति को समझना केवल एकेडमिक जिज्ञासा नहीं है - यह अपने आप को और इस ब्रह्मांड में अपनी जगह को समझने की कोशिश है।
जब सांख्य कहता है कि हम प्रकृति से उत्पन्न हैं, तो वह यह भी कहता है कि हम प्रकृति से अलग नहीं हैं - और इसीलिए प्रकृति को नुकसान पहुँचाना अपने आप को नुकसान पहुँचाना है। जब वेदांत कहता है कि हर जीव में ब्रह्म है, तो वह यह भी कहता है कि किसी को भी दुःख देना ब्रह्म को दुःख देना है। जब पुरुष सूक्त कहता है कि यह पूरा ब्रह्मांड एक ही चेतना का विस्तार है, तो वह हमें एक गहरी करुणा और जुड़ाव का बोध देता है।
नासदीय सूक्त का वह ऋषि जो हज़ारों साल पहले रात के तारों को देखकर पूछता था - 'यह सब कहाँ से आया?' - वह हम सबके भीतर है। और जब भी हम आसमान की तरफ देखकर यही सवाल पूछते हैं, हम उस महान परंपरा से जुड़ जाते हैं जो इस धरती पर सबसे पहले सत्य की खोज में निकली थी।
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय।
हे प्रभु! हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।
यह प्रार्थना ही सृष्टि-दर्शन का अंतिम लक्ष्य है - ज्ञान के द्वारा अज्ञान का नाश, और उस परम सत्ता से जुड़ाव जिससे यह सारी सृष्टि उत्पन्न हुई।
- आचार्य ऋतुराज दुबे | Way to Happiness

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