कल मेरे एक विध्यार्थी ने चर्चा के दौरान पूछा - दादा, हमारे आराध्यों के रंगों का क्या रहस्य है? क्यों कृष्ण मेघ-श्याम ( नीलवर्ण )हैं और राधा गोरी ( सुनहेरी )? क्या यह सिर्फ चित्रकारों की मात्र कल्पना है? नहीं भाई, बिल्कुल नहीं! इसके पीछे तंत्र और योग का वह परम विज्ञान छिपा है, जिसे समझ लेने पर आपका पूरा जीवन-दर्शन ही बदल जाएगा।
कल की चर्चा को इस लेख के माध्यम से आप को प्रस्तुत कर रहा जहां मैं आपको इस रहस्य की गहराई को समझने के लिए में ले चलता हूँ-वहाँ जहाँ रंग केवल रंग नहीं, बल्कि अस्तित्व के परम सत्य के प्रतीक हैं।
समुद्र का नीलापन: कृष्ण की चेतना
तंत्र के दृष्टि कोण से देखें तो कृष्ण साक्षात् 'शिव' हैं, यानी वह शुद्ध चेतना जो स्थिर है, अनंत है, निर्विकार है। अब इसे समझिए एक सुंदर उदाहरण से-जब आप समुद्र के किनारे खड़े होकर दूर तक फैले उस जल-विस्तार को देखते हैं, तो वह कैसा दिखाई देता है? गहरा नीला, है ना? क्यों? क्योंकि उसकी गहराई और विशालता का कोई ओर-छोर नहीं है। वह अथाह है, अतल है, असीम है।
लेकिन अब एक काम कीजिए-उसी समुद्र के पानी को अपने हाथों की अंजलि में भर लीजिए। क्या होता है? वही पानी एकदम पारदर्शी हो जाता है! काँच की तरह साफ! नीलापन गायब! यही कृष्ण हैं, मेरे भाई-बहनों। जब तक आप उन्हें दूर से देखते हैं-भक्ति की आँखों से, प्रेम के भाव से-वे नीले हैं। लेकिन जब आप ध्यान की गहराई में उतरते हैं, जब आप अपने अंदर उनके पास पहुँचते हैं, तो वह 'नीलापन' अब नीला नहीं रहा जाता है। फिर बचती है केवल विशुद्ध चेतना - जो पारदर्शी है, निराकार है, निर्गुण है। इसीलिए तंत्र में कृष्ण को 'पुरुष' कहा गया है- वह तत्व जो हर घट में व्याप्त है, पर निर्लिप्त है।
सुनहरी शक्ति: राधा का स्वरूप
अब बात करें श्री राधा की। राधा जी 'शक्ति' हैं, यानी वह प्रकृति जो इस पूरे दृश्य संसार को रचती है, संचालित करती है। अगर कृष्ण गहरा नीला आकाश हैं, तो राधा उस आकाश में कौंधने वाली सुनहरी बिजली (प्रकाश ) हैं। सोचिए- बिना बिजली ( प्रकाश ) के आकाश का क्या अर्थ? और बिना आकाश के बिजली कहाँ चमकेगी?
इसीलिए राधा 'सुनहरी' हैं। वह इस संसार की चमक (प्रकाश ) हैं, वह जीवन की गति हैं, वह ऊर्जा हैं। कृष्ण यदि 'अस्तित्व' हैं, तो राधा उस अस्तित्व की (गति ) 'नृत्य' हैं। कृष्ण यदि 'मौन' हैं, तो राधा उस मौन से निकालने वाला 'संगीत' हैं। सोना सबसे शुद्ध धातु है - न जंग लगता है, न मैल। वैसे ही राधा भी शुद्ध शक्ति ( जगत जननी जगदंबा भवानी) हैं - जो माया से परे, केवल प्रेम की पवित्रता है।
अद्वैत का मिलन: दो नहीं, एक
अब आते हैं तांत्रिक दर्शन की सबसे सुंदर, सबसे गहरी बात पर। तंत्र 'संसार' को 'परमात्मा' से अलग नहीं मानता। यह वेदांत से इस मायने में अलग है। हम अक्सर सोचते हैं कि भगवान को पाने के लिए दुनिया छोड़नी पड़ेगी, घर-बार त्यागना पड़ेगा। लेकिन कृष्ण और राधा का यह प्रेममय मिलन हमें क्या सिखाता है ।
यह कि - कृष्ण यदि परम सत्य हैं, तो राधा उस सत्य का इस संसार में प्रत्यक्ष अनुभव हैं। बिना संसार के आप परमात्मा को कैसे अनुभव करेंगे? और बिना परमात्मा के यह संसार क्या है? केवल एक खोखला भ्रम। जब कृष्ण राधा की आँखों में झाँकते हैं, तो वे अपनी ही शक्ति को निहार रहे होते हैं। और जब राधा कृष्ण की ओर देखती हैं, तो वे अपनी ही गहराई को, अपने ही स्रोत को देख रही होती हैं। वे दो नहीं हैं। वे 'एक ही चैतन्य' की दो धाराएँ हैं - जैसे एक ही नदी के दो तट। तट अलग दिखते हैं, पर नदी एक ही है।
जीवन में उतारें यह सत्य
मेरे प्यारे भाई-बहनों, योग का अर्थ केवल हाथ-पैर टेढ़े करके आसन करना नहीं है। तंत्र की शिक्षा बहुत स्पष्ट है - अपने पैर जमीन पर टिकाए रखो, यानी संसार की जिम्मेदारियाँ पूरी ईमानदारी से निभाओ - बच्चों की परवरिश करो, घर चलाओ, काम-धंधा करो। और साथ ही अपनी बाँहें आसमान की ओर फैला दो, यानी उस परम तत्व से, उस दिव्यता से जुड़े रहो - साधना करो, ध्यान करो, प्रेम करो।
जब आप कीर्तन में 'कृष्ण' कहते हैं, तो आप किसी बाहरी मूर्ति को नहीं, बल्कि अपनी ही अंदर की उस शाश्वत चेतना को पुकार रहे होते हैं। और जब आप 'राधा' कहते हैं, तो आप जीवन की उस ऊर्जा को, उस शक्ति को नमन कर रहे होते हैं जो आपके रोम-रोम में बह रही है।
कृष्ण और राधा का यह रंगों भरा, प्रेम मिलन हमें यही समझता है कि अध्यात्म और संसार दो अलग-अलग चीजें नहीं हैं। यह देह भी दिव्य है, और इसमें बसने वाला देव भी। रसोई में रोटी बनाते हुए भी आप ध्यान में हो सकते हैं। बच्चों को पढ़ाते हुए भी आप प्रार्थना में हो सकते हैं। दफ्तर में काम करते हुए भी आप उस परम से जुड़े हो सकते हैं।
तो खुलकर नाचिए, खुलकर हँसिए, प्रेम कीजिए। और उस 'नीले' और 'सुनहरे' के इस दिव्य मिलन में - इस अद्वैत के संगम में - खुद को विलीन कर दीजिए। क्योंकि वही है असली योग। वही है सच्ची साधना।
राधे कृष्णा! हरि बोल!
- आचार्य ऋतुराज दुबे
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