मेरे दुखी प्राणियों । आज हम श्री विध्या और श्री चक्र के अंदर गहराई से समझने का प्रयास करेंगे। श्री यंत्र कोई साधारण चित्र नहीं,
बल्कि ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों और हमारे अपने शरीर के अंदर छिपी शक्तियों को समझने का एक अद्भुत मार्ग है। इसे ऐसे समझें जैसे यह पूरे ब्रह्मांड और हमारे शरीर का एक नक्शा है, जो हमें बताता है कि सब कुछ कैसे एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है।
श्री-चक्र: ब्रह्मांड और हमारे शरीर के अंदर का नक्शा
श्री-चक्र को अक्सर एक सुंदर ज्यामितीय ( रेखाओं से बनी ) आकृति के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह उससे कहीं ज़्यादा है। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इसे 'नवरत्न-द्वीप' कहा है, जिसका अर्थ है नौ रत्नों का द्वीप। यह वह पवित्र स्थान है जहाँ ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति, माँ ललिता महात्रिपुरसुंदरी, निवास करती हैं। श्री चक्र का अध्ययन करने पर समझ आता है कि जिस तरह ब्रह्मांड में हर चीज़ एक व्यवस्था में है, वैसे ही हमारे शरीर और मन में भी एक अद्भुत व्यवस्था है।
1. समय का चक्र और श्री-चक्र का गहरा संबंध
हम सभी जानते हैं कि समय लगातार चलता रहता है - दिन, रात, महीने, साल। यह सब एक चक्र में बंधा है, जिसे काल-चक्र कहते हैं। भारतीय ऋषियों मुनियों इस रहस्य को बताया है कि श्री-चक्र और काल-चक्र एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यानी, जो नियम समय को चलाते हैं, वही नियम श्री-चक्र में भी दिखाई देते हैं।
•चंद्रमा की कलाएँ और श्री-चक्र: जैसे चंद्रमा की 16 कलाएँ होती हैं (पूर्णिमा से अमावस्या तक और फिर वापस), वैसे ही श्री-चक्र में भी 16 पंखुड़ियाँ होती हैं। ये पंखुड़ियाँ का सांकेतिक अर्थ हैं कि समय कैसे बदलता है और कैसे हर बदलाव में एक गहरी शक्ति काम करती है। चंद्रमा की 15 कलाएँ बदलती रहती हैं, लेकिन 16वीं कला, जिसे 'चित्रा' कहते हैं, वह कभी नहीं बदलती। यह समय से परे है और हमारे भीतर भी एक ऐसी शक्ति है जो कभी नहीं बदलती, हमेशा स्थिर रहती है।
2. नौ दिव्य शक्तियाँ: ब्रह्मांड की संचालिकाएँ
श्री-चक्र के नौ अलग-अलग हिस्से होते हैं, जिन्हें आवरण कहते हैं। इन हर आवरण पर एक विशेष देवी या शक्ति का राज होता है, जिन्हें चक्रेश्वरी कहा जाता है। ये नौ शक्तियाँ ब्रह्मांड के अलग-अलग पहलुओं को नियंत्रित करती हैं, जैसे समय, स्थान, ज्ञान और धन। इन्हें रत्नों से भी जोड़ा गया है, जो इनकी दिव्य चमक और महत्व को दर्शाते हैं। ये शक्तियाँ हमें बताती हैं कि ब्रह्मांड में हर चीज़ एक व्यवस्था में है और हर चीज़ के पीछे एक दिव्य ऊर्जा काम कर रही है। ये नौ चक्रेश्वरी इस प्रकार हैं:
• काल-चक्रेश्वरी: समय की अधिष्ठात्री (पुखराज रत्न)।
• मुद्रा-चक्रेश्वरी: दिव्य संकेतों और मुद्राओं की स्वामिनी (नीलम रत्न)।
• मातृका-चक्रेश्वरी: वर्णमाला और ध्वनियों की जननी (वैदूर्य रत्न)।
• रत्न-चक्रेश्वरी: बहुमूल्य रत्नों और ऐश्वर्य की देवी (मूँगा रत्न)।
• देश-चक्रेश्वरी: स्थान और दिशाओं की नियंत्रक (मोती रत्न)।
• तत्त्व-चक्रेश्वरी: पारंपरिक ज्ञान और सिद्धांतों की स्वामिनी (पन्ना रत्न)।
• ग्रह-चक्रेश्वरी: नवग्रहों और खगोलीय पिंडों की संचालिका (गोमेद रत्न)।
• मूर्ति-चक्रेश्वरी: स्थूल रूपों और आकृतियों की देवी (माणिक्य रत्न)।
• सर्वानंदमय-चक्रेश्वरी: सर्वोच्च आनंद और बिंदु की स्वामिनी।
3. नौ मुद्राएँ: चेतना को जगाने के गुप्त संकेत
मुद्राएँ हाथों और शरीर की विशेष स्थितियाँ होती हैं, जो हमारी चेतना को एक खास दिशा में केंद्रित करती हैं। श्री-चक्र की साधना में नौ मुख्य मुद्राएँ होती हैं। ये मुद्राएँ केवल शारीरिक क्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि ये हमें अपनी आंतरिक शक्तियों को जगाने और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ने में मदद करती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ मुद्राएँ मन को शांत करती हैं, कुछ ऊर्जा को आकर्षित करती हैं, और कुछ हमें उच्च चेतना की ओर ले जाती हैं। इन मुद्राओं का लाभ हैं कि कैसे हम अपने शरीर और मन का उपयोग करके अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ा सकते हैं। श्री-चक्र की नौ मुख्य मुद्राएँ इस प्रकार हैं:
• सर्वसंक्षोभणी: जो समस्त जगत में हलचल पैदा करती है।
• सर्वाकर्षिणी: जो उच्च ऊर्जाओं को आकर्षित करती है।
• सर्ववशंकरी: जो नियंत्रण और संतुलन स्थापित करती है।
• सर्वोन्मादिनी: जो आध्यात्मिक उन्माद या आनंद प्रदान करती है।
• सर्वमहाकुशा: जो चेतना को सही दिशा में मोड़ती है।
• सर्वखेचरी: जो साधक को आकाश (उच्च चेतना) में ले जाती है।
• सर्वयोनि: जो उत्पत्ति का केंद्र है।
• सर्वबीज: जो समस्त शक्ति का बीज है।
• सर्वत्रिखंडा: जो तीनों लोकों को जोड़ती है।
4. नौ मातृकाएँ: शब्दों और ध्वनियों की शक्ति
हम जो भी बोलते हैं, वह ध्वनियों से बना है। हमारे प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से समझ आता है की ब्रह्मांड का निर्माण भी ध्वनियों से हुआ है। इन मूल ध्वनियों को मातृकाएँ कहते हैं। श्री-चक्र में नौ मातृकाएँ होती हैं, जो हमारी वर्णमाला के स्वरों और व्यंजनों से जुड़ी हैं। शब्दों और ध्वनियों में कितनी शक्ति होती है। जब हम मंत्रों का जाप करते हैं, तो हम इन मातृकाओं की शक्ति का उपयोग करते हैं, जिससे हमारे मन और शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। कि कैसे सही शब्दों और ध्वनियों का उपयोग करके हम अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं और अपनी चेतना को जाग्रत कर ऊर्ध्वगामी कर सकते हैं।
नौ मातृकाएँ और उनके वर्ग इस प्रकार हैं:
• अ-वर्ग: स्वर।
• क-वर्ग: क, ख, ग, घ, ङ।
• च-वर्ग: च, छ, ज, झ, ञ।
• ट-वर्ग: ट, ठ, ड, ढ, ण।
• त-वर्ग: त, थ, द, ध, न।
• प-वर्ग: प, फ, ब, भ, म।
• य-वर्ग: य, र, ल, व।
• श-वर्ग: श, ष, स, ह।
• क्ष-वर्ग: संयुक्त अक्षर।
5. नौ गुरु: ज्ञान की परंपरा
गुरु वह होते हैं जो हमें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। श्री-विद्या में नौ गुरुओं की एक परंपरा है, जो हमें ज्ञान और आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। इन गुरुओं को 'प्रकाशानंद-नाथ' जैसे नामों से जाना जाता है। हमारे शरीर में भी नौ द्वार होते हैं (जैसे आँखें, कान, नाक, मुँह), जिनसे हमारी चेतना बाहर की दुनिया से जुड़ती है। कि कैसे हम इन द्वारों का सही उपयोग करके बाहरी दुनिया के साथ-साथ अपनी आंतरिक दुनिया को भी समझ सकते हैं। नौ गुरुओं के नाम इस प्रकार हैं: प्रकाशानंद-नाथ, विमर्शानंद-नाथ, आनंदानंद-नाथ, ज्ञानानंद-नाथ, पूर्णानंद-नाथ, सत्यानंद-नाथ, कामलानंद-नाथ, भोगानंद-नाथ, और प्रज्ञानंद-नाथ।
6. नौ तत्त्व: ज्ञान की त्रिमूर्ति
श्री-विद्या में तत्त्व का अर्थ केवल भौतिक चीज़ें नहीं है, बल्कि यह ज्ञान को समझने का एक तरीका है। जब हम कुछ भी जानते हैं, तो उसमें तीन चीज़ें होती हैं:
• ज्ञाता: जानने वाला (यानी हम).
• ज्ञेय: वह चीज़ जिसे हम जानना चाहते हैं.
• ज्ञान: ज्ञाता और ज्ञेय के बीच का संबंध.
ये तीनों मिलकर नौ तत्त्वों का निर्माण करते हैं (3x3=9)। ये तत्त्व हमें सिखाते हैं कि हम कैसे अपने अनुभवों को समझते हैं और कैसे ज्ञान प्राप्त करते हैं। यह हमें बताता है कि हर अनुभव में एक गहरा अर्थ छिपा होता है। ये नौ तत्त्व इस प्रकार हैं:
• ज्ञाता (Subject): जानने वाला (साधक)।
• ज्ञेय (Object): जिसे जाना जाए (शक्ति)।
• ज्ञान (Communication): ज्ञाता और ज्ञेय के बीच का संबंध।
ये तीनों (3x3 = 9) मिलकर नौ तत्त्वों का निर्माण करते हैं, जो हमारे अनुभव के संसार को अर्थ प्रदान करते हैं।
7. हमारा शरीर ही श्री-चक्र है
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारा शरीर ही स्वयं श्री-चक्र है। हमारे शरीर के नौ महत्वपूर्ण हिस्से, जैसे त्वचा, रक्त, मांस, अस्थियाँ, और हमारी जीवन शक्ति (वीर्य/शुक्र और ओज), ये सभी नौ रत्नों के समान हैं। दिव्य शक्तियाँ कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने अंदर ही मौजूद हैं। सही तरीके से इनको जाना जाये तो जाग्रत किया जा सकता है ।
अपने अंदर के कल्पवृक्ष को जगाना
श्री-चक्र की साधना का अंतिम लक्ष्य यह समझना है कि हमारा शरीर एक 'कल्पवृक्षों का बगीचा है। कल्पवृक्ष वह पेड़ होता है जो हमारी हर इच्छा को पूरा कर सकता है। जब हम यह जान जाते हैं कि हमारे संकल्प (हमारे दृढ़ विचार और इच्छाएँ) ही कल्पवृक्ष हैं और हमारा मन वह दिव्य उपवन है जहाँ ये संकल्प पनपते हैं, तब हम बाहरी पूजा-पाठ और कर्मकांडों से ऊपर उठकर अपने आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ते हैं। जब हम अपने भीतर की इस दिव्य शक्ति को पहचान लेते हैं, तो हम अपने जीवन को और भी सुंदर और सार्थक बना सकते हैं।
Note :- अगर आप यहाँ पढ़ चुके है तो आप का साधुवाद आप चंद धैर्यवान लोगो मे से है ।
अब आप यहाँ तक आ गए तो फॉलो जरूर करें । जिससे आगे भी लिखने की प्रेरणा प्राप्त होती रहे ।

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