पता नहीं आपने कभी गौर किया है या नहीं, लेकिन साल की कुछ रातें ऐसी होती हैं जो सिर्फ अंधेरा लेकर नहीं आतीं। वे अपने साथ एक अजीब सी बेचैनी लाती हैं, एक गहराई लाती हैं, जैसे कोई आपके अंदर दरवाजा खटखटा रहा हो। महाशिवरात्रि ठीक वैसी ही रात है। इसे 'महामिलन की रात' कहना कोई काव्यात्मक उक्ति भर नहीं है - यह एक जीवंत सच्चाई है, जिसे तांत्रिकों और योगियों ने सदियों से अपने भीतर अनुभव किया है।
वह शून्यता, जो मुक्त करती है
हम अक्सर अंधेरे से डरते हैं, है ना? लेकिन शिव जिस 'अंधेरे' या 'शून्यता' के प्रतीक हैं, वह भयावह नहीं है। तांत्रिक दृष्टि से देखें तो शिव 'शुद्ध प्रकाश' हैं - वह चेतना जो सब कुछ देखती है पर खुद अछूती रहती है। और शक्ति? वह वो ऊर्जा है जो उस प्रकाश को आकार देती है, उसे अभिव्यक्ति देती है। इस रात को तंत्र में 'भैरवोत्सव' कहते हैं। क्यों? क्योंकि यह वह समय है जब हमारे भीतर सोई हुई शक्तियां, हमारी कुंडलिनी, उस शांत और अडिग शिव तत्व से मिलने के लिए छटपटाने लगती है।
यह कोई बाहरी पूजा-पाठ का खेल नहीं है। यह तो अपने ही भीतर के टूटेपन को जोड़ने की, अपने विरोधों को मिटाने की कोशिश है। तंत्र साफ कहता है - आप तब तक अधूरे हैं जब तक आपके भीतर का पुरुष और प्रकृति एक नहीं हो जाते। और यह रात? यह उस 'एक होने' का सबसे सशक्त क्षण है।
आपका शरीर ही स्रष्टि है
योगी इस रात को बड़े वैज्ञानिक नजरिए से देखता है। समझिए कि इस रात ग्रहों की चाल और धरती के झुकाव में कुछ ऐसा होता है कि उत्तरी गोलार्ध में ऊर्जा अपने आप ऊपर की तरफ बहने लगती है। जैसे ऊर्जा का प्रवाह उपर नीचे होता है पर ये महामिलन की रात मे शक्ति नीचे से उपर की तरफ प्रवाहित होने लगती है ,उस ही इस रात आपके अंदर की ऊर्जा ऊपर की ओर उठना चाहती है पर वो उठ नहीं पाती क्योंकी आप को तो नींद आ रही होती है ।अगर आप इस रात सीधे बैठकर थोड़ी देर शांत रहें, तो शायद आपको भी महसूस हो कि अंदर कुछ हलचल है, जैसे कोई चीज ऊपर उठने की कोशिश कर रही हो - बिल्कुल वैसे जैसे नदी अपने उद्गम की तरफ लौटना चाहा रही हो ।
2026 की शिवरात्रि तो कुछ ज्यादा ही खास होने वाली है। इस बार ग्रहों का जो मेल बन रहा है, वो बहुत दुर्लभ है। कुंभ राशि में सूर्य, बुध, शुक्र और राहु - ये चारों एक साथ आ रहे हैं। अब ज्योतिष वाले इसे 'लक्ष्मी नारायण योग' या 'पंचग्रही योग' जैसे विभिन्न नामों से बुलाते हैं, लेकिन सीधी भाषा में समझें तो यह आपके अंदर के बंद दरवाजे खुलने जैसा है। कैसे? देखिए, बुध यानी आपकी सोच-समझ, शुक्र यानी आपकी भावनाएं और इच्छाएं - ये दोनों मिलकर सूर्य यानी उस परम सत्य की ओर मुड़ती हैं। मतलब आपका दिमाग और दिल, दोनों एक ही दिशा में चलने लगते हैं। और जब ऐसा होता है, तो अंदर कुछ खुलता है - कुछ जागता है।
योगदृष्टि जब जब मूलाधार मे सुप्त शक्ति उपर उठकर सहस्रार मे परम तत्व ( शिव) से मिलती है । योगी को समाधि प्राप्त होती है । समधी सरल शब्दों वो अवस्था जहां कुछ पाना , जानना किसी प्रकार का अवरोध शेष नहीं बचता । दूसरे शब्दों मे सभी बंद दरवाजे खुल जाते है ।
लेकिन हम क्या कर रहे हैं?
यहां एक बात सोचने वाली है। आज के समय में ज्यादातर लोग दिन में मंदिर जाते हैं, घंटियां बजाते हैं, आरती करते हैं, और फिर रात को चैन की नींद सो जाते हैं। जबकि महाशिवरात्रि की रात वह रात है जो रोग से, शोक से, दुख और दरिद्रता से मुक्ति की रात मानी गई है। यह वह रात है जब शिव और शक्ति का मिलन होता है - सृष्टि के दो मूल तत्व आपस में घुल-मिल जाते हैं।
पर हम? हम उस समय सो रहे होते हैं।
शिव और शिवा का मिलन पुनर्निर्माण करता है - नए का सृजन करता है। साधक, यानी जागा हुआ मनुष्य, वह इस सच्चाई को जानता है। वह इस रात को जागकर अपना पुनर्निर्माण करता है, अपने अंदर के अंधकार को प्रकाश में बदलता है। जो भोगी हैं, वे सो जाते हैं। लेकिन जो योगी बनने की राह पर हैं, वे जागते हैं और योगेश्वर के साथ एक हो जाते हैं। फर्क बस इतना सा है - जागना या सोना।
जागरण का असली मतलब क्या है?
लोग कहते हैं कि रात भर जागना पुण्य का काम है। ठीक है, लेकिन क्या सिर्फ आंखें खुली रखना ही काफी है? बिल्कुल नहीं। असली जागरण वह है जब आपकी चेतना जाग जाए। जब बाहर की भागदौड़, शोरगुल, सब कुछ शांत पड़ जाए और आपके अंदर का 'मौन' आपसे बात करने लगे।
शिव को 'आदि गुरु' - पहले गुरु - इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने हमें सिखाया कि हम सिर्फ हाड़-मांस का बना यह शरीर नहीं हैं। हम वह अनंत आकाश हैं जिसमें तारे टूटते भी हैं और बनते भी हैं। इस रात का जागरण उसी अनंत आकाश को अपने भीतर महसूस करने का नाम है।
बस ठहर जाइए, एक पल के लिए
इस शिवरात्रि, मैं आपसे बस एक बात कहना चाहूंगा - ज्यादा मंत्रों और पूजा-पाठ के चक्कर में मत उलझिए। विधि-विधान का बोझ सिर पर लादने की जरूरत नहीं। बस इतना कीजिए कि थोड़ी देर चुपचाप बैठ जाइए। अपनी सांसों पर ध्यान दीजिए - देखिए कैसे सांस अंदर आती है, कैसे बाहर जाती है। और उस खाली जगह को महसूस कीजिए जो हर सांस के बीच में आती है - उसी को तो हम शिव कहते हैं।
यह जो महामिलन की बात हो रही है, वो आपके और कहीं दूर बैठे किसी भगवान के बीच का नहीं है। यह तो आपके अपने अधूरेपन और पूरेपन के बीच का मिलन है। समझिए कि आप जो अपने आप को टूटा-बिखरा महसूस करते हैं, वही टुकड़े फिर से जुड़ते हैं। आप फिर से पूरे होते हैं।
और हो सकता है, बस हो सकता है, इस रात आपको समझ आ जाए कि जिस शिव को आप मंदिरों में, पहाड़ों पर, बाहर कहीं खोज रहे थे - वो तो आप खुद ही हैं। वो आपके अंदर ही बैठा है, बस जागना भर बाकी है।
ॐ नमः शिवाय।

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