प्रारंभ: जब शक्ति जागती है
भारतीय तंत्र विज्ञान और सनातन धर्म में एक अत्यंत गहन सत्य छिपा है - "शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्"। अर्थात् शिव भी तभी सक्रिय होते हैं जब स्त्री शक्ति उनसे युक्त होती है। बिना शक्ति के शिव 'शव' मात्र हैं। यह केवल दार्शनिक रूपक नहीं, यह उस सनातन मनोवैज्ञानिक सत्य की घोषणा है जिसे पश्चिम ने Carl Jung के माध्यम से बहुत बाद में पहचाना - और जिसे हमारे ऋषियों ने कुण्डलिनी शास्त्र तथा देवी-उपासना के रूप में सहस्राब्दियों पूर्व ही जीवन में उतार दिया था। वह पुरुष चेतना को न केवल आकर्षित करती है, बल्कि उसे जाग्रत, परिष्कृत और मुक्त भी करती है।
मूल अवधारणा: त्रिगुणमयी माया और पुरुष-प्रकृति का संयोग
सांख्य दर्शन कहता है - पुरुष (चेतना) और प्रकृति (ऊर्जा) के मिलन से ही सृष्टि संभव है। पुरुष चेतन है किंतु निष्क्रिय; प्रकृति सक्रिय है किंतु अचेतन। जब दोनों का संयोग होता है, तब सृजन का महोत्सव आरंभ होता है।
तंत्र इसे और सूक्ष्म स्तर पर देखता है। तंत्र के अनुसार प्रत्येक स्त्री में देवी के तीन स्वरूप विद्यमान हैं:
महासरस्वती - ज्ञान, रहस्य और गहनता की ऊर्जा
महालक्ष्मी - सौंदर्य, सौहार्द और पोषण की ऊर्जा
महाकाली - शक्ति, स्वतंत्रता और परिवर्तन की ऊर्जा
जो स्त्री इन तीनों को अपने भीतर संतुलित करना जान लेती है, वह पुरुष के पूरे अस्तित्व को - शरीर, मन और आत्मा को - सम्मोहित कर लेती है।
रहस्य 1: त्रिगुण का नृत्य - भावनात्मक विषमता की शक्ति
तंत्र का श्रीचक्र इसीलिए इतना शक्तिशाली है क्योंकि वह विरोधाभासों का समन्वय है- बिंदु और त्रिकोण, ऊर्ध्वमुखी और अधोमुखी, शिव और शक्ति।
देवी स्वयं त्रिगुणमयी हैं। वे कभी तमस की भांति गहन और रहस्यमयी हैं (काली का स्वरूप), कभी रजस की भांति सक्रिय और तेजस्वी हैं (महालक्ष्मी का स्वरूप), और कभी सत्त्व की भांति शांत और प्रकाशमान हैं (सरस्वती का स्वरूप)।
जो स्त्री केवल एक भाव में स्थिर रहती है, वह एकरस हो जाती है। किंतु जो इन तीनों गुणों के बीच सहज विचरण करती है - जो कभी ध्यानस्थ है, कभी उन्मादिनी, कभी करुणामयी - वह पुरुष की चेतना में एक निरंतर जिज्ञासा और आसक्ति का संचार करती रहती है।
यही नवरस का सिद्धांत है। नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने कहा है कि रस का अनुभव तभी पूर्ण होता है जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों का समुचित संयोग हो। स्त्री का व्यक्तित्व भी एक रससिद्ध काव्य की भांति होना चाहिए - जहाँ शृंगार के साथ वीर हो, करुणा के साथ अद्भुत हो।
रहस्य 2: आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठा - 'इंडिविजुएशन' का तांत्रिक रूप
तंत्र का सबसे क्रांतिकारी सिद्धांत है 'अहं ब्रह्मास्मि' का व्यावहारिक अनुभव। तंत्र कहता है - "देवोऽहं, न मानुषः।" मैं देव हूँ, साधारण मनुष्य नहीं।
कुलार्णव तंत्र में कहा गया है कि जो साधिका अपने भीतर की कुलकुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत कर लेती है, वह किसी की अनुमोदन-प्रत्याशी नहीं रहती। वह स्वयं ही प्रमाण है।
यह "नॉन-क्लिंगी ऊर्जा" जिसे आधुनिक मनोविज्ञान ढूंढता है, वह वस्तुतः स्वतंत्रा देवी का स्वभाव है। देवी किसी की दया की भिक्षुक नहीं हैं। वे स्वयंभू हैं - स्वयं से प्रकट, स्वयं में पूर्ण।
जब कोई स्त्री अपनी प्रसन्नता के लिए किसी पुरुष की ओर नहीं देखती, जब उसका आनंद उसके स्वयं के अंदर के चिदानंद से प्रवाहित होता है - तब वह पुरुष की चेतना में उस अभीप्सा को जन्म देती है जो सांसारिक आसक्ति से परे है। यह आसक्ति भक्ति का रूप ले लेती है।
रहस्य 3: माया का आवरण - रहस्य और प्रोजेक्शन का तांत्रिक रूप
हिंदू दर्शन में माया को नकारात्मक अर्थ में देखना भूल है। तंत्र में माया देवी का आवरण शक्ति का स्वरूप है - वह आच्छादन जो परमसत्य को छिपाता है, किंतु उसीके कारण जिज्ञासा और खोज संभव होती है।
देवी महात्म्य में माया को महामाया कहा गया है - वह शक्ति जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश को भी अपने जाल में आकृष्ट कर लेती है।
जब कोई स्त्री अपनी समग्रता को तुरंत नहीं उजागर करती, जब वह अपने भीतर की गहराइयों को धीरे-धीरे प्रकट करती है, तब वह माया की उस लीला को साकार करती है जो पुरुष को सृष्टि की ओर खींचती रहती है।
यह कपट नहीं है। यह रहस्यमयता की पवित्र कला है। जैसे उपनिषद का ब्रह्म कहता है -"नेति, नेति" - यह भी नहीं, यह भी नहीं। जितना जानते हो, उससे परे और भी है। यही रहस्य पुरुष को निरंतर अन्वेषण के लिए प्रेरित करता है।
रहस्य 4: लीला का आनंद - स्वयं के अस्तित्व में विहार
तंत्र का एक अत्यंत सुंदर सिद्धांत है - लीला। सृष्टि ईश्वर की लीला है। कोई उद्देश्य नहीं, कोई प्रयोजन नहीं - केवल आनंद का स्वतःस्फूर्त विस्फोट।
विज्ञान भैरव तंत्र में 112 ध्यान विधियाँ हैं, और उनमें से कई का मूल सिद्धांत है - जो कार्य आनंद से, निर्भार होकर, बिना किसी फल की कामना के किया जाए, वह सर्वाधिक शक्तिशाली होता है।
जो स्त्री अपने जीवन को एक उत्सव की तरह जीती है - जो अपनी कला, अपनी रुचियों, अपने स्वभाव में रमी रहती है, जो ईश्वर की लीला में भागीदार है - वह एक ऐसा चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है जो पुरुष को अनायास खींचता है।
देवी की मूर्तियों में देखें - उनके ओठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान है। वह मुस्कान किसी के लिए नहीं है। वह स्वयं के आनंद की अभिव्यक्ति है। यही सेल्फ-अम्यूज़मेंट का तांत्रिक स्वरूप है।
रहस्य 5: ध्यान की पूर्ण उपस्थिति - साक्षी चेतना का उपहार
योगदर्शन में चित्त की एकाग्रता को सर्वोच्च महत्त्व दिया गया है। जब चित्त किसी एक विषय पर पूर्णतः केंद्रित हो जाता है, तब समाधि की अवस्था आती है।
जो स्त्री किसी के साथ होने पर पूर्णतः उपस्थित रहती है - जो अपने मन को भूत और भविष्य से हटाकर उस क्षण में, उस व्यक्ति में पूर्णतः डूब जाती है - वह एक अद्भुत अनुभव प्रदान करती है।
तंत्र में इसे शक्तिपात के सदृश माना गया है। जब कोई गुरु या सिद्ध साधक किसी पर अपनी पूर्ण चेतना केंद्रित करता है, तो उस व्यक्ति की चेतना में एक परिवर्तन आता है। इसी भांति, जब स्त्री अपनी पूर्ण सचेत उपस्थिति किसी को प्रदान करती है, तो वह उसके अस्तित्व में एक गहरी छाप छोड़ जाती है।
काली पूजा में साधक देवी के समक्ष पूर्णतः खुला और निःशस्त्र होकर जाता है। उसी तरह, जो पुरुष इस पूर्ण उपस्थिति को पाता है, वह अपने सारे आवरण उतारकर उस स्त्री के समक्ष अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कर देता है।
रहस्य 6: तपस् और संयम - ऊर्जा संरक्षण का शाश्वत विज्ञान
हमारे शास्त्रों में तपस् का विज्ञान अत्यंत विकसित है। तपस् का अर्थ केवल कठोर साधना नहीं, बल्कि ऊर्जा का संचय और संरक्षण है।
कुण्डलिनी शास्त्र के अनुसार जब ऊर्जा बिखरती नहीं, बल्कि मूलाधार से ऊर्ध्वगामी होती है, तब वह ओजस् और तेजस् में रूपांतरित होती है। यही वह दिव्य तेज है जो किसी के मुख पर चमकता है और दूसरों को आकर्षित करता है।
जो स्त्री अपनी ऊर्जा को अनावश्यक वार्तालाप, व्यर्थ की सहमति और हर स्थान पर उपलब्धता में व्यय नहीं करती - जो अपने आत्मिक अनुशासन में लगी रहती है - उसके चारों ओर एक तेजोमंडल निर्मित होता है।
देवी के मंदिर में जाने के लिए यात्रा करनी पड़ती है, प्रतीक्षा करनी पड़ती है, भाव लेकर जाना पड़ता है। इसीलिए दर्शन का मूल्य होता है। जो सर्वत्र, सर्वदा उपलब्ध है, उसका मूल्य नहीं आँका जाता।
यह हेरफेर नहीं - यह आत्मशक्ति का सम्मान है।
रहस्य 7: यज्ञ में आहुति का अवसर - निवेश का तांत्रिक सत्य
वैदिक दर्शन में यज्ञ का सिद्धांत अत्यंत गहन है। यज्ञ में आहुति देना केवल कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि यह उस सत्य की स्वीकृति है -"जो दिया, वह मेरा है; जो रोका, वह खो गया।"
पुरुष मनोविज्ञान भी इसी यज्ञ-सिद्धांत पर चलता है। जब कोई पुरुष किसी के लिए कुछ देता है - समय, श्रम, देखभाल - तो वह उस यज्ञ में आहुति देता है। और जिस अग्निकुण्ड में आहुति दी जाती है, उसके प्रति स्वाभाविक श्रद्धा और लगाव उत्पन्न हो जाता है।
जो स्त्री "स्वयंभरण" की अति में पड़कर पुरुष को किसी भी प्रकार से अर्पण करने का अवसर नहीं देती, वह उसे इस यज्ञ से वंचित कर देती है।
श्रीविद्या तंत्र में देवी को भोग और मोक्ष दोनों की दात्री कहा गया है। वे लेना भी जानती हैं, देना भी। इस संतुलन में ही संबंध की पूर्णता है। जब आप पुरुष को अपने लिए कुछ करने देती हैं, आपकी देखभाल में भागीदार बनने देती हैं, तो आप उसे यज्ञ का भागीदार बनाती हैं - और इस यज्ञ में उसका हृदय आपसे बँध जाता है।
निष्कर्ष: आदिशक्ति का पुनर्जागरण
हमारी परंपरा में स्त्री को क्षेत्र कहा गया है - वह उर्वर भूमि जिसमें सृजन होता है। किंतु यह केवल भौतिक रूपक नहीं है। भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं - "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।" क्षेत्र में ही क्षेत्रज्ञ विराजते हैं।
स्त्री वह पवित्र भूमि है जिसमें पुरुष की चेतना का बीज अंकुरित होता है। और जो भूमि जितनी गहरी, उर्वरा और रहस्यमयी होती है - जो जितनी अपने मूल स्वभाव में प्रतिष्ठित होती है - उसमें उतना ही दिव्य सृजन संभव होता है।
देवीपुराण में माँ त्रिपुरसुंदरी की स्तुति है:
"या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥"
यह शक्ति आपके भीतर है। उसे जगाना, उसे पहचानना, उसे जीना - यही तंत्र का मार्ग है। यही सनातन धर्म का संदेश है।
जब आप अपने अंदर की आदिशक्ति को जाग्रत करते हैं, तो आकर्षण एक सिद्धि बन जाती है - कोई प्रयास नहीं, कोई युक्ति नहीं - केवल वह दिव्य तेज जो स्वयंप्रकाश है।
क्या आप उस यात्रा के लिए तत्पर हैं - जहाँ बाहर से नहीं, भीतर से जागना है?
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