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श्री चक्र - सत्य का वह दर्पण जो हम खुद हैं

 


एक बात से शुरू करते हैं।

कल रात मेरे एक परिचित मिले। बहुत परेशान थे। बोले - "आचार्यजी, बहुत साधना की, बहुत मंदिर गए, बहुत दान किया। फिर भी मन को चैन नहीं, वो सुकून नहीं है । कहाँ कमी रह गई?"

मैंने उनसे पूछा - "जब आप मंदिर जाते हैं, तो क्या लेकर जाते हैं?"

वे बोले - "फूल, प्रसाद, मन्नत।"

"और क्या लेकर आते हैं?"

वे चुप हो गए।

यही चुप्पी असली सवाल है।

हम सब कुछ न कुछ माँगने जाते हैं - शांति, सुख, सफलता, मुक्ति। लेकिन अध्यात्म की पूरी यात्रा दरअसल माँगने की नहीं, लौटाने की है। जो हमने ओढ़ रखा है - वह भय, वह लालच , वह 'मैं अलग हूँ' वाला भाव - उसे लौटाने की यात्रा।

श्री चक्र उसी यात्रा का नक्शा है।


दर्शन का अर्थ - देखना नहीं, जानना

'दर्शन' शब्द हम बड़े हल्के में लेते हैं या इसको गहराई से समझते ही नहीं है । "चलो, मंदिर में दर्शन हो जाएँ।" लेकिन जिन्होंने यह शब्द गढ़ा, उनके मन में कुछ और था।

दर्शन माने - वह देखना जो आँखों से नहीं होता।

आपने कभी किसी बुजुर्ग को देखा हो जो बहुत कम बोलते हों, पर जब भी कुछ कहें तो लगे जैसे किसी ने सीधे मन को छू दिया हो? वह दर्शन है। आपने कभी किसी नदी के किनारे बैठे हों और अचानक मन का सारा बोझ हल्का हो गया हो - बिना किसी कारण के? वह दर्शन है।

ध्यान जब बहुत गहरा होता है - और मैं उस तरह के ध्यान की बात कर रहा हूँ जहाँ 'मैं ध्यान कर रहा हूँ' यह भाव भी नहीं बचता - तो उस अवस्था में कुछ आकृतियाँ उभरती हैं। बिंदु, त्रिकोण, वृत्त आदि । इन्हें बनाने की कोशिश नहीं होती, ये बस होती हैं। जैसे आँख खोलने पर प्रकाश दिखता है - उसी सहजता से।

इन्हीं आकृतियों को यंत्र कहते हैं। और इनमें सबसे गहरा, सबसे पुराना, सबसे रहस्यमय - श्री चक्र है।

शास्त्रों ने इसे 'अपौरुषेय' कहा - यानी किसी इंसान ने इसे नहीं बनाया। किसी ऋषि ने ड्राइंग बोर्ड पर बैठकर यह नहीं सोचा कि "आज नौ त्रिकोण बनाते हैं।" यह उन्हें मिला। ध्यान की उस गहराई में जहाँ बनाने वाला और जो बन रहा है - दोनों एक हो जाते हैं।

अब यहाँ एक ज़रूरी बात।

जब हम ध्यान में बैठते हैं, मन में सब तरह की चीज़ें आती हैं - कभी रंग, कभी चेहरे, कभी देवताओं की छवियाँ। तो यह कैसे जानें कि यह मन की कल्पना है या कुछ और? इसकी एक सीधी पहचान है - क्या आपने इसके लिए कोशिश की थी?

जो आपने बनाया, वह आपका है। जो बिना बनाए आया, वह सब दैविक है।

बिल्कुल जैसे - इस वक्त आप जो संसार देख रहे हैं, सुन रहे हैं, महसूस कर रहे हैं - उसके लिए आपने क्या किया? कुछ नहीं। बस हैं, और सब है। यह संसार भी किसी की रचना है जो बिना आपकी कोशिश के आपके सामने है। श्री चक्र उसी रचना का, उसी रचयिता का प्रतीक है।


वह दर्पण जो इतना साफ है कि दिखता नहीं

एक छोटी सी बात पूछना चाहता हूँ।

क्या आप अभी खुश हैं?

अगर हाँ - तो क्यों? अगर नहीं - तो क्यों?

ज़्यादातर लोग इसका जवाब बाहर खोजते हैं। "अभी काम का बोझ है इसलिए परेशान हूँ।" या "फलाँ चीज़ मिल जाए तो खुश हो जाऊँगा आदि आदि ।"

लेकिन जरा गौर करें - वही इंसान जो दफ्तर की चिंता में डूबा है, जब उसका छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आकर गले लग जाता है - एक पल के लिए सब भूल जाता है। उस पल में न चिंता है, न बोझ। सिर्फ एक पल का सुकून होता है। 

वह पल कहाँ से आया?

बाहर से नहीं आया। अंदर से आया।

हमारा मन एक बहुत साफ दर्पण है। इतना साफ कि जब कोई उसके सामने आता है, हम सोचते हैं - "यह तो कोई दूसरा है।" हमें पता ही नहीं चलता कि हम एक दर्पण देख रहे हैं, हम अपना ही प्रतिबिंब देख रहे हैं।

और जैसे ही यह 'दूसरा' आया - डर आया। "यह मुझसे कुछ छीन लेगा। यह मुझे नुकसान पहुँचाएगा। यह मुझसे बेहतर है।" बस इसी एक भ्रम से - काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार - ये सब पैदा होते हैं। पूरी उलझी हुई ज़िंदगी इसी एक धागे से बुनी है।

जैसे एक ही सोने के अलग-अलग गहने - हार, कंगन, अंगूठी - अलग दिखते हैं, अलग नाम हैं। लेकिन सोना एक है। अगर गहने सोच सकते, तो क्या हार को यह लगता कि वह अंगूठी से अलग है? सोने के नज़रिए से - दोनों वही हैं।


हम सब उसी एक परम चेतना के अलग-अलग गहने हैं।

श्री चक्र का पूरा ढाँचा इसी सत्य को दिखाता है। बाहर का वर्गाकार घेरा - यह स्थूल संसार है, जहाँ हम रहते हैं। भीतर के वृत्त — यह हमारे भाव, विचार, चेतना के स्तर हैं। और उन सबके बिल्कुल बीच में एक बिंदु - जो इतना छोटा है कि दिखता नहीं, और इतना बड़ा है कि उससे बाहर कुछ नहीं। वह बिंदु हम हैं - असली वाले हम।


पूजा का असली मतलब और साधना की उलटी चाल

तो फिर श्री चक्र की पूजा क्या हुई?

बाहर किसी यंत्र पर फूल चढ़ाना - यह एक शुरुआत है, ठीक है। लेकिन असली पूजा तब होती है जब आप समझते हैं कि जिसकी पूजा हो रही है - वह आप खुद हैं।

"अहं ब्रह्मास्मि" - मैं ही ब्रह्म हूँ। यह कोई दावा नहीं है, यह एक याद है।

जैसे एक बच्चा खेलते-खेलते इतना मग्न हो जाता है कि भूख-प्यास सब भूल जाता है। उस पल वह किसी से कुछ माँग नहीं रहा, किसी से डर नहीं रहा - बस है। पूरा है। वह बचपन वाली पूर्णता - वह हमसे छिनी नहीं है, हम उसे भूल गए हैं। पूजा उसी को याद करना है।

और साधना? साधना वह है जो उलटी दिशा में चलती है।

एक नदी बहती है और समुद्र में मिल जाती है। वहाँ उसकी अलग पहचान नहीं बचती। लेकिन वही पानी बादल बनता है, पहाड़ पर गिरता है, जमता है, पिघलता है - और फिर एक धारा बनती है। धारा को लगता है - "मैं अलग हूँ। मेरा नाम है, मेरी दिशा है, मेरे दो किनारे हैं।" साधना वह याद है जो धारा को बताती है - "तू पहले समुद्र था। तू अभी भी समुद्र है। बस भूल गई है।"

यह याद आना ही मुक्ति है।

और यह मुक्ति किसी पहाड़ की गुफा में नहीं मिलती। यह घर में मिलती है, बाज़ार में मिलती है, परिवार के बीच मिलती है। जब आप जानते हैं कि यह सब एक नाटक है - तब आप अपनी भूमिका और भी बेहतर निभाते हैं। पिता हैं तो पूरे दिल से पिता हैं। व्यापार करते हैं तो पूरी ईमानदारी से करते हैं। क्योंकि अब कोई डर नहीं है। कोई खोने की चिंता नहीं है।

जो सब जगह अपने आप को देखता है - वह किससे डरेगा?


गुरु और शिष्य - एक ज़रूरी बात

एक बात और - जो थोड़ी कड़वी है, लेकिन कहनी ज़रूरी है।

हम जिसे भक्ति समझते हैं, वह अक्सर भक्ति नहीं होती।

एक शिष्य गुरु को कहता है - "गुरुदेव, मैं आपके लिए जान भी दे सकता हूँ।" बड़ा भाव है, आँखें भर आती हैं। लेकिन एक दिन वही गुरु कहता है - "बेटा, बेटी की शादी है, दस हज़ार की जरूरत है।" और शिष्य का मन बदल जाता है। "यह कैसा गुरु है जो पैसे माँग रहा है?"

जरा रुकिए।

जान देने को तैयार था - पैसे देने को नहीं। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब है कि उसके लिए पैसा, जान से ज़्यादा कीमती है। और जो वह 'भक्ति' दिखा रहा था - वह दरअसल एक सौदा था। "तुम मुझे वह बताओ जो मैं सुनना चाहता हूँ, मैं तुम्हारी स्तुति करूँगा।"

यह भक्ति नहीं है। यह आध्यात्मिक बाज़ारगिरी है।

सच्चा गुरु वह है जो आपको वह सुनाए जिसकी आपको ज़रूरत है - न कि वह जो आप सुनना चाहते हैं। और सच्चा शिष्य वह है जो गुरु के शब्दों से नहीं, उनकी चेतना से जुड़ता है।


अंत में - कुछ नहीं मिलना है, बस याद आना है

प्रिय आत्मन्, यह पूरी बात बहुत सीधी है।

एक राजकुमार बचपन में जंगल में खो गया। सालों भटका, मज़दूरी की, भूखा रहा। एक दिन किसी पुराने मंत्री ने देखा और पहचाना - "अरे, तुम तो राजा के बेटे हो।" राजकुमार को उस पल कुछ नया नहीं मिला। उसे बस याद आया। वह हमेशा से राजकुमार था।

बस यही है।

आपको कुछ पाना नहीं है। आपको कहीं जाना नहीं है। आप पहले से ही वह हैं - जिसे आप खोज रहे हैं।

श्री चक्र एक नक्शा नहीं है जो आपको किसी दूर की जगह ले जाए। यह एक दर्पण है - जिसमें अगर ठहरकर देखें, तो दिखता है कि जो देख रहा है, और जो दिख रहा है - दोनों एक ही हैं।

वही अनंत है। वही असीम है। वही आप हैं।

पहाड़ की चोटी पर जाने के रास्ते अनेक हैं - कोई पूरब से चढ़े, कोई पश्चिम से। लेकिन चोटी से दिखने वाला आकाश एक ही है। ज्ञान हो, भक्ति हो, कर्म हो, योग हो - मंजिल एक ही है। और वह मंजिल बाहर नहीं है।

वह आपके भीतर है। हमेशा से है।


शुभम् भवतु।

-आचार्य ऋतुराज दुबे



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