क्या आपने कभी किसी को देखा है जो दिखने में बिल्कुल आम हो, न कोई खास चेहरा, न महंगे कपड़े, न ऊंचा रुतबा, फिर भी जब वो किसी कमरे में आते हैं तो सबकी नज़रें अपने आप उनकी तरफ मुड़ जाती हैं? लोग उनसे बात करना चाहते हैं, उनके पास बैठना चाहते हैं, उनसे जुड़ना चाहते हैं। और आप सोचते रह जाते हैं कि ऐसा क्यों होता है?
यह कोई जादू नहीं है। यह कोई किस्मत भी नहीं है। यह एक शक्ति है जो हर इंसान के अंदर होती है। बस हममें से ज़्यादातर लोग इससे अनजान हैं।
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हम सोचते हैं कि जो सुंदर दिखता है वही आकर्षक होता है। लेकिन यह सच नहीं है। आपने खुद देखा होगा कि कुछ लोग बेहद खूबसूरत होते हैं पर उनके पास बैठने का मन नहीं करता। और कुछ लोग एकदम सादे होते हैं पर उनके पास जाने पर अजीब सा सुकून मिलता है। यह फर्क चेहरे का नहीं, अंदर की ऊर्जा का है। हमारे पुराने शास्त्रों में कामदेव को "अनंग" कहा गया है यानी जिसका कोई शरीर नहीं। वे विशुद्ध ऊर्जा हैं। इसका सीधा अर्थ यही है कि असली आकर्षण कभी बाहरी नहीं होता, वह हमेशा अंदर से आता है।
मन की दशा ही सब कुछ है
भारतीय आध्यात्मिक मनोविज्ञान में मन को सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। जब मन अंदर से डरा हुआ और बेचैन होता है तो वह बेचैनी आपके चेहरे पर, आपकी आवाज़ में, आपके पूरे व्यवहार में झलकती है। सामने वाला बिना समझे भी उसे महसूस कर लेता है और धीरे धीरे दूर होने लगता है। इसके उलट जब आप अंदर से शांत होते हैं, जब आपको खुद पर भरोसा होता है तो आपके आसपास एक अलग ही माहौल बन जाता है और लोग उस माहौल में आना चाहते हैं।
तंत्र में इसे चित्त की शुद्धि कहते हैं। चित्त जब निर्मल होता है तो व्यक्ति का आभामंडल विस्तृत हो जाता है और यही विस्तृत आभामंडल दूसरों को अपनी ओर खींचता है। इसीलिए हमारे शास्त्रों में मौन को इतनी बड़ी शक्ति माना गया है। जो इंसान हर बात बोल देता है, हर राज़ खोल देता है, उसमें कोई खिंचाव नहीं रहता। जो कम बोलता है उसकी हर बात वज़न रखती है। बहुत ज़्यादा बोलना और हर समय बेचैन रहना प्राण ऊर्जा को नष्ट करता है और जिसकी ऊर्जा नष्ट हो जाए वह दूसरों को क्या देगा?
हर इंसान के अंदर एक अधूरापन है। कोई ताकतवर है पर कोमलता चाहता है, कोई होशियार है पर उसे कोई समझने वाला चाहिए, कोई बाहर से मज़बूत दिखता है पर अंदर से बहुत अकेला है। ये वर्तमान की सच्चाई है ,आज के रिश्ते बाहर से कितना मधुर या अच्छे लगें पर वास्तव मे वह अंदर से खोखले होते है । लोग बस निभा रहे है ,जो निभा नहीं पाते वो अलग हो जाते है या कोई दूसरा साथी खोजते है ।
तंत्र दर्शन में शिव और शक्ति की बात इसीलिए की गई है कि दोनों अलग अलग अधूरे हैं और मिलकर पूर्ण बनते हैं। जब आप किसी इंसान को इतनी गहराई से समझ लेते हैं कि उसे लगे कि यह मुझे जानता है, यह मुझे समझता है, तो वो इंसान आपसे उस तरह जुड़ जाता है जैसे बिछड़ा हुआ हिस्सा मिल गया हो। यह जुड़ाव किसी दिखावे से नहीं बनता, यह बनता है सुनने से, महसूस करने से और सच में परवाह करने से।
जो गुप्त है वही शक्तिशाली है
एक खुली किताब को कोई बार बार नहीं पढ़ता। जो इंसान हर किसी के लिए हर वक्त उपलब्ध है, जो हर बात बता देता है, हर जगह मिल जाता है, उसकी कद्र धीरे धीरे खत्म हो जाती है। लेकिन जो इंसान थोड़ा गहरा है, जिसमें कुछ अनकहा है, जिसे पूरी तरह जान पाना मुश्किल लगे, उसके बारे में मन में जिज्ञासा बनी रहती है। मन बार बार उसी के बारें मे सोचता है । समुद्र इसीलिए आकर्षित करता है क्योंकि उसकी गहराई का अंदाज़ा नहीं होता। आप भी ऐसे ही बनिए। अपनी हर बात, हर दर्द, हर राज़ हर किसी के सामने मत रखिए। अपने अंदर थोड़ी गहराई रखिए। यही गहराई लोगों को आपकी तरफ बार बार खींचती है।
हम सब एक नकाब ओढ़कर जीते हैं। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं बहुत ठीक हूँ, मैं किसी से कम नहीं, यह नकाब हमें अंदर से कमजोर कर देता है। और दूसरों को यह नकाब दिखने लगता है, भले ही वो कुछ कहें नहीं। जब आप अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार करते हैं, जब आप बिना बनावट के सामने आते हैं तो एक अजीब सी राहत होती है, सामने वाले को भी और आपको भी। शास्त्रों में इसे अहंकार का समर्पण कहा गया है। लोग परफेक्ट इंसान से नहीं जुड़ते, लोग असली इंसान से जुड़ते हैं। और यही सहजता सबसे बड़ा आकर्षण है।
आज की सबसे बड़ी तकलीफ यह है कि हम शरीर से तो किसी के साथ होते हैं पर मन से कहीं और होते हैं। लेकिन जब कोई इंसान आपके साथ बैठे और उसे महसूस हो कि आप पूरी तरह उसी के साथ हैं, उसकी बात सुन रहे हैं, उसे देख रहे हैं, उसे महसूस कर रहे हैं तो वो पल उसके लिए बहुत खास बन जाता है। तंत्र में इसे चेतना उठने की अवस्था कहा गया है जब दो लोगों के बीच एक ऐसा घेरा बनता है जहाँ बाकी दुनिया का शोर बंद हो जाता हैं। इसी एकांत में सबसे गहरा जुड़ाव पैदा होता है।
यह सब पढ़कर अगर आपको लगा कि हाँ, यह मेरी बात है, तो समझ लीजिए कि यह शक्ति आपमें पहले से है। बस कहीं दब गई है। भीड़ में, शोर में, दूसरों की उम्मीदों में। इसे जगाना कोई रात भर का काम नहीं है पर शुरुआत आज से हो सकती है। तंत्र और ध्यान की कुछ विशेष विधियों के द्वारा अपने अंदर की आकर्षण शक्ति को जाग्रत किया जा सकता है । अपने रिश्तों , व्यापार , कार्य क्षेत्र मे प्रगति की जा सकती है ।
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- आचार्य ऋतुराज दुबे

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