वेद, उपनिषद, गीता, आगम और महान आचार्यों के प्रमाणों सहित
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आचार्य ऋतुराज दुबे द्वारा - आज की पीढ़ी के लिए
Way to Happiness - पराविज्ञान की पाठशाला
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"तंत्र भोग नहीं, जागरण का मार्ग है"
आचार्य के शब्दों में
प्रिय जिज्ञासुओं ,
तुमने जब पहली बार सूर्य को उगते देखा होगा, तो मन में एक प्रश्न अवश्य उठा होगा - यह सब क्या है? मैं कौन हूँ? कहाँ से आया? कहाँ जाऊँगा? यही प्रश्न उपनिषद् के ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व पूछे थे, और उनका उत्तर आज भी उतना ही सत्य है जितना तब था।
यह ग्रंथ उन्हीं उत्तरों की तलाश है। यहाँ न केवल दर्शन है, बल्कि वेद-मंत्रों के प्रमाण हैं, महान आचार्यों के भाष्य हैं, और सबसे बड़ी बात - यह ज्ञान तुम्हारे जीवन में काम आए, इसलिए सरल भाषा में समझाया गया है।
हम इस ग्रंथ में निम्नलिखित विषयों पर क्रमशः विचार करेंगे:
आत्मा का स्वरूप - वैदिक और दार्शनिक दृष्टि से
चेतना क्या है - और उसकी चार अवस्थाएं
तीन शरीर और पाँच कोश
प्राण विज्ञान - दस प्राण और उनके कार्य
जीवात्मा और परमात्मा - तीन महान दर्शन
कर्म सिद्धांत - संचित, प्रारब्ध, आगामी
मोक्ष - वेदों में प्रमाण, आचार्यों के मत और मोक्ष की अवस्थाएं
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अध्याय १ - आत्मा : वह कौन है जो तुम्हारे अंदर जाग रहा है?
१.१ आत्मा का अर्थ और शब्द-व्युत्पत्ति
बच्चो, सबसे पहले एक सरल प्रश्न - क्या तुम वही हो जो आईने में दिखता है? तुम्हारा शरीर तो बचपन से अब तक बदल चुका है, फिर भी 'तुम' वही हो। यह 'तुम' जो नहीं बदला - वही आत्मा है।
संस्कृत में 'आत्मा' शब्द 'अत्' धातु से बना है जिसका अर्थ है 'सदा चलने वाला'। एक अन्य व्युत्पत्ति के अनुसार 'आ' अर्थात् व्यापक और 'तम' अर्थात् प्रकाश - वह जो सर्वत्र प्रकाश फैलाता है। कुछ आचार्य इसे 'अह' (चेतावनी) और 'तम' (अंधकार) के योग से भी देखते हैं - वह सत्ता जो जीव को अंधकार में गिरने से बचाती है।
भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा की परिभाषा स्वयं देते हैं:
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥ (गीता २.२३)
अर्थ: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
और फिर गीता का वह प्रसिद्ध श्लोक:
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ (गीता २.२०)
अर्थ: यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है - शरीर के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होती।
१.२ वेदों में आत्मा का उल्लेख
आत्मा की अवधारणा केवल दर्शन की खोज नहीं है - यह वेदों का मूल प्राण है।
ऋग्वेद में कहा गया है:
अयं यः पुरुषो देहे संस्थितः परमेश्वरः। (ऋग्वेद १०.९०.१)
अर्थ: देह में स्थित यह पुरुष (आत्मा) ही परमेश्वर का अंश है।
यजुर्वेद में कहा गया:
अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव।
ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि॥ (यजुर्वेद ३१.१८)
अर्थ: मैं वृक्ष की जड़ की भाँति स्थिर हूँ, पर्वत की पृष्ठभूमि-सा। मैं ऊपर उठा हुआ, पवित्र और अमृत स्वरूप हूँ।
अथर्ववेद में आत्मा को 'अमर दीप' कहा गया है:
आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भः। (अथर्ववेद १०.८.४३)
अर्थ: आत्मा देवताओं का और इस भुवन का गर्भ (मूल) है।
१.३ उपनिषदों में आत्मा - 'तत् त्वम् असि'
उपनिषद वेदों का सार हैं। आत्मा की सबसे गहरी चर्चा यहीं मिलती है।
छान्दोग्य उपनिषद में महर्षि उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु को नौ बार समझाते हुए कहते हैं:
तत् त्वम् असि, श्वेतकेतो! (छान्दोग्य उपनिषद ६.८.७)
अर्थ: 'वह परम सत्य - तू ही है, हे श्वेतकेतो!'
बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते हैं:
अयं आत्मा ब्रह्म। (बृहदारण्यक उपनिषद २.५.१९)
अर्थ: यह आत्मा ही ब्रह्म है।
मांडूक्य उपनिषद का पहला ही श्लोक घोषणा करता है:
सर्वं ह्येतद् ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म। (मांडूक्य १.२)
अर्थ: यह सब कुछ ब्रह्म ही है, और यह आत्मा ब्रह्म है।
कठोपनिषद में यम (मृत्यु के देवता) नचिकेता को आत्मा का रहस्य समझाते हैं:
अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्। (कठोपनिषद १.२.२०)
अर्थ: आत्मा अणु से भी सूक्ष्म है और महान से भी महान - यह प्रत्येक प्राणी के हृदय-गुफा में छिपी है।
१.४ आत्मा की प्रमुख विशेषताएं
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अध्याय २ - चेतना : वह धरातल है जिस पर सृष्टि खेलती है
२.१ चेतना क्या है ?
बच्चो, जब तुम सोते हो तो सपने देखते हो, जब जागते हो तो संसार देखते हो, और जब गहरी नींद में जाते हो तो कुछ नहीं जानते - परंतु सुबह उठकर कहते हो 'बड़ी अच्छी नींद आई।' इसका अर्थ है कि कोई था जो उस गहरी नींद में भी साक्षी था। वही चेतना है।
आत्मा और चेतना के बीच सम्बन्ध भारतीय दर्शन का सबसे सूक्ष्म विषय है। अद्वैत वेदांत के अनुसार:
"आत्मा ही शुद्ध चेतना है। चेतना उसका गुण नहीं, उसका स्वरूप है।"
मांडूक्य उपनिषद इस विषय में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें चेतना की चार अवस्थाओं का वर्णन है जिन्हें 'अवस्था-चतुष्टय' कहते हैं।
२.२ चेतना की चार अवस्थाएं - अवस्था-चतुष्टय
मांडूक्य उपनिषद कहता है:
जागरितस्थानो बहिः प्रज्ञः सप्तांग एकोनविंशतिमुखः।
स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः॥ (मांडूक्य उपनिषद ३)
अवस्था १ - जाग्रत (Waking State)
यह वह अवस्था है जिसमें तुम अभी हो। इसे 'वैश्वानर' कहते हैं।
इस अवस्था में चेतना बाहर की ओर प्रवाहित होती है - आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं, मन सोचता है। यहाँ 19 साधन सक्रिय होते हैं: 5 ज्ञानेंद्रियाँ, 5 कर्मेंद्रियाँ, 5 प्राण, मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त।
वैदिक दृष्टि से यह 'विश्व' की अवस्था है - जहाँ स्थूल शरीर से व्यवहार होता है। इस अवस्था में जीव दृश्य जगत को सत्य मानता है।
अवस्था २ - स्वप्न (Dream State)
इसे 'तैजस' कहते हैं। यहाँ चेतना अंदरकी ओर मुड़ जाती है।
स्वप्न में न कोई बाहरी जगत है, न कोई वास्तविक वस्तु - फिर भी तुम्हारा मन पूरी एक दुनिया बना देता है। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि चेतना में सृजन की अपूर्व शक्ति है - वह स्वयं ही दृष्टा भी है और दृश्य भी।
स्वप्नस्थानोऽन्तः प्रज्ञः सप्तांग एकोनविंशतिमुखः।
प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः॥ (मांडूक्य उपनिषद ४)
अवस्था ३ - सुषुप्ति (Deep Sleep)
इसे 'प्राज्ञ' कहते हैं। यह गहरी नींद की अवस्था है।
यहाँ न कोई स्वप्न है, न कोई विचार। यहाँ जीव आनंद में होता है। इसीलिए सुबह उठकर सभी कहते हैं 'बड़ी अच्छी नींद आई।' यह आनंद कहाँ से आया? बाहर से नहीं - अपनी ही आत्मा के निकट से।
परंतु यह पूर्ण जागृति नहीं है, क्योंकि यहाँ अज्ञान (माया का पर्दा) अभी भी है - बस वह सक्रिय नहीं है। यह कारण शरीर की अवस्था है।
अवस्था ४ - तुरीय (The Fourth - Pure Awareness)
यह सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है। 'तुरीय' का अर्थ है 'चौथा' - परंतु वास्तव में यह चौथी अवस्था नहीं, बल्कि वह आधार है जिस पर बाकी तीन अवस्थाएं टिकी हैं।
नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनम्।
न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टम् अव्यवहार्यम् अग्राह्यम् अलक्षणम्।
अचिन्त्यम् अव्यपदेश्यम् एकात्मप्रत्ययसारम्।
प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवम् अद्वैतम्।
चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः॥ (मांडूक्य उपनिषद ७)
अर्थ: वह न अंदरजानता है, न बाहर, न दोनों ओर। वह न प्रज्ञा-घन है, न प्रज्ञ, न अप्रज्ञ। वह अदृश्य, व्यवहार-शून्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिंत्य, अवर्णनीय, केवल एक-आत्म-प्रत्यय का सार है। वह प्रपंच से परे, शांत, शिव और अद्वैत है - वही तुरीय है, वही आत्मा है, वही जानने योग्य है।
यही वह अवस्था है जिसे साधना में प्राप्त किया जाता है। योगी, तपस्वी और ज्ञानी इसी की खोज में जीवन लगाते हैं।
२.३ पाँचवीं अवस्था - तुरीयातीत
कुछ महान तांत्रिक और कश्मीर शैव ग्रंथों में - विशेषकर 'तन्त्रालोक' और 'विज्ञानभैरव' में - एक पाँचवीं अवस्था का भी उल्लेख है जिसे 'तुरीयातीत' कहते हैं।
यह वह अवस्था है जहाँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति - तीनों में तुरीय की झलक आने लगती है। साधक को दुकान में बैठे, घर में चलते-फिरते, बातें करते हुए भी अंदरवह साक्षी भाव बना रहता है। यह जीवनमुक्त पुरुष की अवस्था है।
२.४ चेतना, चैतन्य और साक्षी - तीन का अंतर
आचार्य शंकर ने विवेकचूडामणि में स्पष्ट कहा है:
साक्षी चेतः केवलो निर्गुणश्च। (विवेकचूडामणि - ९१)
अर्थ: साक्षी शुद्ध चेतना है - केवल, निर्गुण।
अध्याय ३ - तीन शरीर और पाँच कोश : तुम सिर्फ देह नहीं हो
३.१ तीन शरीर - त्रयी देह
बच्चो, जब तुम किसी ने मरे व्यक्ति को देखा हो, तो सोचो - शरीर तो वैसा ही है, फिर क्या चला गया? वह जो चला गया, उसका क्या हुआ? भारतीय दर्शन कहता है - वह 'सूक्ष्म शरीर' किसी अन्य शरीर में चला गया।
प्रत्येक जीव के तीन शरीर होते हैं:
१. स्थूल शरीर (Gross Body)
यह वह शरीर है जो दिखता है - हड्डी, माँस, रक्त, नाड़ियाँ। यह पंचमहाभूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) से बना है।
वेदांत सार में कहा है: 'अन्नमयः कोशः स्थूलशरीरम्' - अन्न (भोजन) से बना यह शरीर।
इसकी उम्र है - जन्म, बाल्यकाल, यौवन, वार्धक्य और मृत्यु। मृत्यु के बाद यह पंचमहाभूतों में विलीन हो जाता है।
२. सूक्ष्म शरीर (Subtle Body)
यह शरीर दिखाई नहीं देता परंतु इसी में तुम्हारी भावनाएं, इच्छाएं, स्वप्न और विचार निवास करते हैं।
सांख्य दर्शन में इसे 'लिंग शरीर' कहते हैं। इसमें 19 तत्व होते हैं:
5 ज्ञानेंद्रियाँ (श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण)
5 कर्मेंद्रियाँ (वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ)
5 प्राण (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान)
4 अंतःकरण (मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त)
यही शरीर मृत्यु के बाद आत्मा के साथ यात्रा करता है और नए शरीर में प्रवेश करता है। इसीलिए इसे 'यात्री शरीर' भी कह सकते हैं।
३. कारण शरीर (Causal Body)
यह सबसे सूक्ष्म शरीर है - अविद्या (माया/अज्ञान) से निर्मित। इसमें हमारे सभी जन्मों के संस्कारों के बीज सोए रहते हैं।
गहरी नींद (सुषुप्ति) में हम इसी शरीर में होते हैं। जब तक यह कारण शरीर है, पुनर्जन्म है। जब यह भी जल जाए - तब मोक्ष।
वेदांतसार में लिखा है: 'कारणशरीरं अज्ञानमात्रम्' - कारण शरीर केवल अज्ञान है।
३.२ पाँच कोश - पंच कोश
तैत्तिरीय उपनिषद में भृगुवल्ली में पाँच कोशों का वर्णन मिलता है। यह ब्रह्म की पाँच परतें हैं जिनमें आत्मा आवृत है:
तैत्तिरीय उपनिषद का वह सुंदर वर्णन:
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते। याः काश्च पृथिवीं श्रिताः।
अथो अन्नेनैव जीवन्ति। अन्तं यन्त्यभिसंविशन्ति।
अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्। (तैत्तिरीय उपनिषद २.२)
अर्थ: अन्न से ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न से जीते हैं और अंत में अन्न में ही लौट जाते हैं।
परंतु आत्मा इन पाँचों कोशों से परे है - 'कोशातीत' है। जिस दिन साधक इन पाँचों कोशों को 'मैं नहीं हूँ' कहकर पार कर लेता है, वह आत्मज्ञान को उपलब्ध होता है।
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अध्याय ४ - प्राण विज्ञान : जीवन की सूक्ष्म शक्ति
४.१ प्राण क्या है?
बच्चो, जब डॉक्टर कहते हैं कि हृदय धड़क रहा है - तो वह किस शक्ति से धड़क रहा है? यही प्राण है।
प्राण को ब्रह्मांडीय जीवन-शक्ति कहते हैं। यह जीव और भौतिक शरीर के बीच की कड़ी है।
ब्रह्मबिंदु उपनिषद में कहा है:
प्राणो वा सर्वस्य जीवनम्। (ब्रह्मबिंदु उपनिषद)
अर्थ: प्राण ही सबका जीवन है।
प्रश्न उपनिषद में छह प्राश्नियक ऋषि महर्षि पिप्पलाद के पास प्रश्न लेकर आते हैं। उनका प्रमुख प्रश्न यही है - इस जगत का आधार कौन है? पिप्पलाद उत्तर देते हैं:
प्राण एव प्रजापतिः। (प्रश्न उपनिषद)
अर्थ: प्राण ही प्रजापति (सृष्टिकर्ता) है।
४.२ पाँच मुख्य प्राण
४.३ पाँच उप-प्राण
चरक संहिता में प्राण को 'चेतना का वाहन' कहा गया है। प्राणायाम का विज्ञान इन्हीं प्राण-वायुओं को संतुलित करने की विधि है।
अध्याय ५ - जीवात्मा और परमात्मा : एक हैं या अलग ?
५.१ मुण्डक उपनिषद का दो पक्षियों का रूपक
यह भारतीय दर्शन का सबसे प्रसिद्ध रूपक है:
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति अनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति॥ (मुण्डक उपनिषद ३.१.१)
अर्थ: एक ही वृक्ष पर दो मित्र पक्षी बैठे हैं। उनमें से एक फल खाता है (जीवात्मा - जो कर्मों का भोग करता है), दूसरा बिना खाए केवल देखता रहता है (परमात्मा - जो साक्षी है)।
यह रूपक तीनों दर्शनों की दृष्टि से समझना आवश्यक है।
५.२ तीन महान दर्शन
दर्शन १ - अद्वैत वेदांत (आदि शंकराचार्य)
आदि शंकराचार्य (७८८-८२० ई.) ने माया का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उनका मत है कि जीवात्मा और परमात्मा में कोई वास्तविक भेद नहीं है।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।
अर्थ: ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है और जीव ब्रह्म से अलग नहीं है।
शंकराचार्य ने चार महावाक्यों को अद्वैत का आधार बनाया:
शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र भाष्य में कहा है:
जीवो ब्रह्मैव नापरः, माया-उपाधि-भेदेन भिन्न इव प्रतीयते।
अर्थ: जीव ब्रह्म से अलग नहीं है। माया के आवरण के कारण वह अलग प्रतीत होता है।
दर्शन २ - विशिष्टाद्वैत (रामानुजाचार्य)
रामानुजाचार्य (१०१७-११३७ ई.) ने अद्वैत की 'माया' की अवधारणा को अस्वीकार किया। उनका मत है कि जगत और जीव दोनों ब्रह्म के शरीर हैं।
उन्होंने श्रीभाष्य (ब्रह्मसूत्र पर भाष्य) में लिखा:
ईश्वरस्य सर्वे चेतनाचेतनात्मकाः देहाः।
अर्थ: ईश्वर के सभी चेतन और अचेतन - उसके शरीर हैं।
रामानुजाचार्य के अनुसार संबंध:
परमात्मा - शरीरी (नियंता, आत्मा)
जीवात्मा और जगत - शरीर (नियंत्रित)
जीव भिन्न भी है और अभिन्न भी - जैसे लहर और समुद्र
दर्शन ३ - द्वैत वेदांत (मध्वाचार्य)
मध्वाचार्य (१२३८-१३१७ ई.) ने पाँच शाश्वत भेदों (पंच-भेद) की स्थापना की:
मध्वाचार्य ने महाभारत तात्पर्य निर्णय में कहा:
स्वतंत्रः एकः हरिः, परतंत्राश्च जीवाः।
अर्थ: केवल हरि (विष्णु) स्वतंत्र है, जीव परतंत्र हैं।
५.३ तुलनात्मक दृष्टि
अध्याय ६ - कर्म सिद्धांत : नियति और स्वतंत्रता का रहस्य
६.१ कर्म का वैदिक आधार
बच्चो, क्या तुमने कभी सोचा है कि एक घर में जन्मे दो भाइयों का जीवन इतना अलग क्यों होता है? एक सफल, एक असफल - क्यों? भारतीय दर्शन का उत्तर है - कर्म।
ब्रह्मसूत्र में कहा है:
फलमतः उभयलिंगात्। (ब्रह्मसूत्र ३.२.३८)
अर्थ: कर्म का फल उभय लिंग (जन्म और मृत्यु दोनों में) से जुड़ा है।
छान्दोग्य उपनिषद में भी यह स्पष्ट है:
यथाकारी यथाचारी तथा भवति। (छान्दोग्य उपनिषद ३.१४.१)
अर्थ: मनुष्य जैसा करता है, जैसा बर्ताव करता है - वैसा ही बनता है।
६.२ कर्म के तीन प्रकार
योगवासिष्ठ और ब्रह्मसूत्र के आधार पर कर्म की तीन श्रेणियाँ हैं:
भगवद्गीता में भगवान ने कहा:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (गीता २.४७)
अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं। फल की इच्छा मत करो, परंतु कर्म से भागो भी मत।
६.३ प्रारब्ध और पुरुषार्थ
एक बड़ा प्रश्न - यदि प्रारब्ध पहले से तय है, तो मेहनत का क्या अर्थ?
इसका उत्तर देते हुए भर्तृहरि ने नीतिशतक में कहा है:
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥ (नीतिशतक)
अर्थ: कार्य उद्यम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छाओं से नहीं। सोए हुए सिंह के मुँह में हिरण स्वयं नहीं आते।
वेदांत का उत्तर है:
प्रारब्ध परिस्थितियाँ तय करता है - प्रतिक्रिया हमारी स्वतंत्रता है
आज का पुरुषार्थ कल का प्रारब्ध बनता है
आत्मज्ञान से संचित और आगामी कर्म भस्म हो जाते हैं
प्रारब्ध को जीते हुए साक्षी भाव से देखना - यही योग है
अध्याय ७ - मोक्ष : क्या वेदों में सच में लिखा है ?
७.१ एक महत्वपूर्ण प्रश्न - क्या मोक्ष केवल दर्शन है ?
बच्चो, यह प्रश्न बहुत ईमानदार है - और आज के पढ़े-लिखे युवा यही पूछते हैं। क्या 'मोक्ष' केवल शंकराचार्य जैसे दार्शनिकों का आविष्कार है? या इसका उल्लेख वेदों में भी है?
उत्तर है - मोक्ष की अवधारणा का मूल वेदों में ही है। इसे विस्तार बाद में मिला, परंतु बीज वेदों में ही बोया गया था।
७.२ वेदों में मोक्ष का उल्लेख
ऋग्वेद में
ऋग्वेद के प्रसिद्ध 'नासदीय सूक्त' (१०.१२९) में सृष्टि से पहले की अवस्था का वर्णन है - वह अवस्था जहाँ न सत् था, न असत्, न मृत्यु, न अमरता। वेद कहता है कि वह 'एक' अपनी शक्ति से साँस लेता था - बिना किसी बाहरी सहारे के। यही अवस्था मोक्ष की अवस्था से मिलती-जुलती है।
तमासीत् तमसा गूळमग्रे अप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत् तपसस्तन्महिनाजायतैकम्॥ (ऋग्वेद १०.१२९.३)
ऋग्वेद में 'अमृतत्व' की कामना बारंबार है:
मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्। (ऋग्वेद)
अर्थ: मुझे मृत्यु से मुक्त करो, अमृत से मत।
यही 'मृत्यु से मुक्ति' की कामना मोक्ष की मूल प्रेरणा है।
यजुर्वेद में
यजुर्वेद में बृहदारण्यक उपनिषद का वह प्रसिद्ध मंत्र जो प्रत्येक हिंदू के हृदय में गूँजता है:
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय॥ (बृहदारण्यक उपनिषद १.३.२८, यजुर्वेद)
अर्थ: असत् से सत् की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।
यह मंत्र सीधे मोक्ष की प्रार्थना है।
यजुर्वेद ४०.१५ में भी मोक्ष का संकेत है:
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।
अर्थ: प्राण वायु में लीन हो जाए, यह शरीर अंत में भस्म हो जाए - इस प्रकार आत्मा अमृत (मोक्ष) प्राप्त करे।
सामवेद में
सामवेद में छान्दोग्य उपनिषद का स्रोत है, जिसमें 'मोक्ष' की अवस्था को 'सत्' में लीन होने के रूप में वर्णित किया गया है:
सदेव सोम्येदमग्र आसीत्, एकमेवाद्वितीयम्। (छान्दोग्य उपनिषद ६.२.१)
अर्थ: हे सौम्य! प्रारंभ में यह सब केवल 'सत्' था - एक, अद्वितीय। मोक्ष उसी 'सत्' में वापस लौटना है।
अथर्ववेद में
अथर्ववेद में मोक्ष का स्पष्ट उल्लेख 'मुक्ति' शब्द से आता है:
यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्।
सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति॥ (अथर्ववेद १.१.१)
अर्थ: जो परम आकाश (परमब्रह्म) की गुफा में छिपे हुए (आत्मा) को जानता है, वह ब्रह्म के साथ सभी कामनाओं को प्राप्त करता है - यही मोक्ष है।
७.३ महान आचार्यों के मत
आदि शंकराचार्य
शंकराचार्य ने विवेकचूडामणि में मोक्ष की परिभाषा दी:
मोक्षो हि नाम नैरात्म्यप्रतिपत्तिः।
अर्थ: मोक्ष उस अवस्था का नाम है जब 'मैं शरीर हूँ' - यह भाव मिट जाए।
उन्होंने 'जीवनमुक्ति' की अवधारणा दी - जीते-जी मोक्ष। उनके अनुसार जो व्यक्ति जान लेता है 'अहं ब्रह्मास्मि' - वह इसी जन्म में मुक्त है, मृत्यु के बाद नहीं।
ब्रह्मसूत्र भाष्य में उन्होंने स्पष्ट किया:
ज्ञानाद् एव तु कैवल्यम्। (ब्रह्मसूत्र भाष्य ३.४.१)
अर्थ: ज्ञान से ही कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त होता है।
रामानुजाचार्य
रामानुजाचार्य ने श्रीभाष्य में कहा:
मुक्तिर्हि नाम परमात्म-साक्षात्कारः।
अर्थ: मुक्ति परमात्मा का साक्षात्कार है - पूर्ण विलय नहीं।
उनके अनुसार मोक्ष में जीवात्मा की पहचान बनी रहती है, वह परमात्मा के साथ अनंत काल तक प्रेम की अवस्था में रहती है।
मध्वाचार्य
मध्वाचार्य ने तत्वसंहिता में कहा:
मुक्तानां विष्णुपादसेवा एव परमानंदः।
अर्थ: मुक्त आत्माओं के लिए विष्णु के चरणों की सेवा ही परम आनंद है।
अभिनवगुप्त (कश्मीर शैव दर्शन)
महाभैरव अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक में मोक्ष की परिभाषा सबसे विस्तृत रूप में दी। उनके अनुसार:
मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूप-प्रथनं हि सः। (तन्त्रालोक १.२)
अर्थ: मोक्ष कोई दूसरी चीज नहीं है - अपने स्वरूप का प्रकाशित होना ही मोक्ष है।
यह शाक्त-तांत्रिक दृष्टि है - मोक्ष ऊपर से नहीं आता, अंदरसे प्रकट होता है।
७.४ मोक्ष का शाब्दिक अर्थ और व्याकरण
'मोक्ष' शब्द मुच् धातु से बना है जिसका अर्थ है - छूटना, मुक्त होना।
मोक्ष = मोह + क्षय (मोह का क्षय होना)
मुक्ति = मुच् + क्तिन् (जन्म-मृत्यु की श्रृंखला से मुक्ति)
निर्वाण = नि + वा + ण (दीपक का बुझना - बौद्ध परंपरा में)
कैवल्य = केवल + ल्य (केवल रहना - सांख्य/योग में)
७.५ मोक्ष की अवस्थाएं - जीवनमुक्ति और विदेहमुक्ति
१. जीवनमुक्ति - जीते-जी मोक्ष
यह अद्वैत वेदांत की अनूठी देन है। जीवनमुक्त पुरुष संसार में रहते हुए भी उससे मुक्त है।
योगवासिष्ठ में श्री राम जीवनमुक्ति के लक्षण पूछते हैं और महर्षि वसिष्ठ कहते हैं:
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् जीवनमुक्त उच्यते।
अर्थ: जो सभी प्राणियों में समभाव रखता है और फिर भी व्यवहार करता है - वह जीवनमुक्त है।
जीवनमुक्त के लक्षण:
२. विदेहमुक्ति - शरीर त्याग के बाद मोक्ष
जब प्रारब्ध कर्म का क्षय होता है और स्थूल शरीर छूटता है - तब जीवनमुक्त विदेहमुक्त हो जाता है।
ब्रह्मसूत्र में कहा है:
भोगेन त्वितरे क्षपयित्वा संपद्यते। (ब्रह्मसूत्र ४.१.१९)
अर्थ: प्रारब्ध को भोगकर समाप्त करके ज्ञानी ब्रह्म में मिल जाता है।
७.६ भक्ति मार्ग में पाँच प्रकार की मुक्ति
भागवत पुराण और वैष्णव संप्रदाय में मोक्ष को पाँच रूपों में देखा गया है:
एक सुंदर उदाहरण: मीराबाई का द्वारिकाधीश में समा जाना - यह सायुज्य मुक्ति का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
७.७ मोक्ष का मार्ग - त्रिविध साधना
गीता में तीन मार्गों का वर्णन है:
रामकृष्ण परमहंस कहते थे:
"जिस मार्ग से जाओ, पहाड़ की चोटी एक ही है।"
आचार्य का संदेश
प्रिय जिज्ञासु बालक,
तुमने यहाँ तक पढ़ा - यह अपने आप में एक साधना है। जिसे इन प्रश्नों में रुचि है - 'मैं कौन हूँ, कहाँ से आया, कहाँ जाऊँगा' - वह पहले से ही आत्मज्ञान की राह पर है।
इस ग्रंथ में हमने देखा:
आत्मा वह है जो शरीर के जन्म से पहले था और मृत्यु के बाद भी रहेगा
चेतना की चार अवस्थाएं - जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय - हमारे अस्तित्व के आयाम हैं
तीन शरीर और पाँच कोश - हम इनसे बने हैं पर इनसे परे हैं
प्राण वह शक्ति है जो शरीर को जीवित रखती है
कर्म हमारे अनुभवों की रूपरेखा बनाते हैं, परंतु आत्मज्ञान उन्हें जला देता है
मोक्ष केवल दर्शन नहीं - यह वेदों की घोषणा, उपनिषदों का अनुभव और महान आचार्यों की जीवन-साधना है
अंत में मैं तुम्हें वह मंत्र देता हूँ जो मेरे गुरु ने मुझे दिया था, और जो शायद तुम्हारे जीवन का दीपक बन जाए:
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु।
मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ: हम साथ रक्षित हों, साथ पालित हों, साथ वीर्यशाली बनें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो। हम कभी द्वेष न करें। शांति, शांति, शांति।
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अध्याय ८ - शाक्त, शैव और वैष्णव : मोक्ष के तीन द्वार
इस ग्रंथ को पढ़कर एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है - इतने मत, इतनी व्याख्याएं, इतने प्रमाण... तो मोक्ष का सच्चा मार्ग कौन सा है? और जब कुलार्णव तंत्र कहता है -
"कुलं विना न मोक्षः स्यात् कुलं विना न सिद्धयः।
तस्मात् कुलपथं श्रेष्ठं सर्वतंत्रेषु गीयते॥" (कुलार्णव तंत्र)
तो क्या बाकी सब मार्ग मोक्ष से वंचित हैं? इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि तीनों परंपराएं मोक्ष को किस दृष्टि से देखती हैं।
८.१ वैष्णव मत - प्रेम ही मोक्ष है
वैष्णव परंपरा मोक्ष को प्रेम के शिखर के रूप में देखती है। यहाँ ईश्वर से विलय नहीं, ईश्वर के साथ शाश्वत संबंध ही परम लक्ष्य है। भागवत पुराण में भगवान कपिल कहते हैं -
"न कामये राज्यं न स्वर्गं न मोक्षं न अपुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्॥" (भागवत पुराण ९.२१.१२)
अर्थ: मुझे राज्य नहीं चाहिए, स्वर्ग नहीं चाहिए, यहाँ तक कि मोक्ष भी नहीं चाहिए। मैं केवल यह चाहता हूँ कि दुख से पीड़ित प्राणियों का कष्ट दूर हो।
यह वैष्णव मत का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य है - यहाँ मोक्ष से भी बड़ा है भक्ति का प्रेम। मध्वाचार्य कहते हैं कि मोक्ष में भी जीव की अपनी पहचान बनी रहती है क्योंकि प्रेम के लिए दो चाहिए। रामानुजाचार्य के शब्दों में -
"मुक्तिर्हि नाम परमात्म-साक्षात्कारः।" (श्रीभाष्य, रामानुजाचार्य)
अर्थ: मुक्ति परमात्मा का साक्षात्कार है। यह अनुभव संबंध का है - विनाश का नहीं।
वैष्णव मार्ग में संसार को त्यागने की नहीं, ईश्वर को हर वस्तु में देखने की साधना है। तुलसीदास कहते हैं - "सीयराममय सब जग जानी।" यही संसार में रहते हुए मोक्ष की अवस्था है।
८.२ शैव मत - स्वरूप की पुनः-पहचान ही मोक्ष है
कश्मीर शैव दर्शन भारतीय दर्शन परंपराओं में सबसे तीक्ष्ण और सूक्ष्म है। अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक में लिखा -
"मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूप-प्रथनं हि सः।" (तन्त्रालोक १.२)
अर्थ: मोक्ष कोई दूसरी वस्तु नहीं है - अपने शिव-स्वरूप का प्रकाशित होना ही मोक्ष है।
कश्मीर शैव में इसे "प्रत्यभिज्ञा" कहते हैं - अर्थात् पुनः-पहचान। तुम शिव थे, हो और रहोगे - बस माया के कारण यह भूल गए। शिवसूत्र का पहला सूत्र घोषणा करता है -
"चैतन्यमात्मा।" (शिवसूत्र १.१, वसुगुप्त)
अर्थ: आत्मा चेतना है - और वह चेतना शिव है। इसलिए कश्मीर शैव में मोक्ष के लिए न शरीर छोड़ने की प्रतीक्षा है, न किसी लोक की यात्रा। इसी देह में, इसी जन्म में, जब अंदरयह पहचान जाग जाए कि "मैं ही शिव हूँ" - तभी मोक्ष है।
शैव सिद्धांत (दक्षिण की परंपरा) इसे "पाशमुक्ति" कहता है - पाश अर्थात् वे तीन बंधन जो जीव को जकड़े हुए हैं: आणव (अहंकार-मल), मायीय (माया-मल), और कार्म (कर्म-मल)। इन तीनों पाशों के कटते ही जीव शिव हो जाता है। शिव और जीव में अंतर केवल पाश का है - स्वरूप का नहीं।
८.३ शाक्त मत - भोग और मोक्ष एक साथ : श्रेष्ठता का रहस्य
शाक्त मत की दृष्टि सभी परंपराओं में सबसे अधिक समग्र और समावेशी है। यहाँ न कुछ त्यागना है, न किसी को निम्न मानना है। कुलार्णव तंत्र में ही कहा गया है -
"देहो देवालयः प्रोक्तः जीवो देवः सनातनः।" (कुलार्णव तंत्र)
अर्थ: देह ही देवालय है, जीव ही सनातन देव है। जब देह स्वयं मंदिर है, तो फिर किसे छोड़ना? किसे अपवित्र मानना?
शाक्त मत में मोक्ष का अर्थ है - शक्ति का पूर्ण जागरण। कुंडलिनी शक्ति जो मूलाधार में सोई है, वह जब सहस्रार में शिव से मिलती है - यही मोक्ष है। और यह मोक्ष संसार को छोड़कर नहीं, संसार को पूरी तरह जीते हुए होता है। यही शाक्त मार्ग की सबसे बड़ी विशेषता है। योगिनीहृदय तंत्र में कहा गया है -
"भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी।" (योगिनीहृदय तंत्र)
अर्थ: भगवती भुक्ति (भोग) और मुक्ति दोनों देने वाली हैं। यह एक साथ दोनों - यही शाक्त मार्ग की अनूठी देन है।
अब "कुलं विना न मोक्षः" का रहस्य समझो - यहाँ "कुल" का अर्थ केवल शाक्त संप्रदाय नहीं है। "कुल" का अर्थ है वह जीवित, सक्रिय गुरु-शिष्य परंपरा जिसमें शक्ति - यानी चेतना का प्रवाह - गुरु से शिष्य में प्रवाहित होती है। बिना इस जीवित परंपरा के कोई भी मार्ग केवल शब्दों का जाल बनकर रह जाता है। महानिर्वाण तंत्र में महादेव स्वयं कहते हैं -
"ये येन भावयन्ति स्वं ते तेन मुच्यते सुरि।" (महानिर्वाण तंत्र १.१७)
अर्थ: जो जिस भाव से अपने को देखता है - वह उसी भाव से मुक्त होता है। अर्थात् मोक्ष का द्वार किसी एक संप्रदाय का एकाधिकार नहीं है।
८.४ तीनों परंपराओं की तुलना - एक दृष्टि में
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आचार्य का अंतिम संदेश - मत नहीं, मार्ग चाहिए
प्रिय साधक,
इस पूरे ग्रंथ को पढ़ने के बाद तुम्हारे मन में मत, व्याख्याएं और शास्त्र-वचनों का एक विशाल संसार खड़ा हो गया होगा। वेदांत, शैव, शाक्त, वैष्णव - सबके अपने-अपने प्रमाण हैं, अपने-अपने आचार्य हैं, अपनी-अपनी शब्दावली है। यह सब पढ़कर दिशा तो मिल सकती है - पर प्राप्ति बिना चले नहीं मिलती।
जो शास्त्रों में लिखा है - वह उन ऋषियों, आचार्यों और साधकों का सत्य है। उन्होंने जो खोजा, जो अनुभव किया, उसे शब्दों में उतारा। वे शब्द अब भी जीवित हैं। पर ध्यान रहे - वह उनका सत्य था। तुम्हें अपना सत्य खोजना है।
मनुष्य का प्रथम कर्तव्य क्या है? - ईश्वर द्वारा प्रदत्त जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए ईश्वर को प्राप्त करना। यानी भौतिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन को साथ-साथ साधना। जो दोनों को साधता है - वही सच्चा साधक है। कुछ छोड़कर कुछ पाना साधना नहीं है। जो पिता की जिम्मेदारी छोड़कर साधु बन गया, जिसने संसार को ही शत्रु मान लिया - उसने अपना कर्तव्य नहीं निभाया।
यह भोग-जगत है। यहाँ भोगने के लिए ही भेजे गए हो। और जब तक इसे पूरी तरह भोगते नहीं - मुक्त भी नहीं होते। जो भूखा है वह खाना देखकर ललचाता है। जो तृप्त है वह देखकर भी विचलित नहीं होता। यही तृप्ति मोक्ष की पहली सीढ़ी है। इसलिए संसार से भागो मत - संसार को जियो, पर होशपूर्वक।
शाक्त मार्ग इसीलिए श्रेष्ठ है - क्योंकि वह किसी को त्यागने को नहीं कहता। वह न किसी को निम्न मानता है, न किसी को अपवित्र। क्योंकि जो दृष्टि जाग जाती है उसमें - हर वस्तु, हर व्यक्ति, हर परिस्थिति में भगवती का ही वास है। वह सब उसी का प्रकट रूप है, अपना ही है। यह दृष्टि सच्चा प्रेम है। इसी प्रेम-दृष्टि के द्वारा जीव संसार को भोगता भी है, उसमें लिप्त भी नहीं होता, और धीरे-धीरे मुक्त भी होता है।
इसलिए - व्याख्याओं में मत उलझो। ये व्याख्याएं समाज में तुम्हें ज्ञानी का पद दिला सकती हैं, धन और यश अर्जित करा सकती हैं - पर मुक्त नहीं कर सकतीं। ज्ञान की दुकान और ज्ञान का अनुभव - दोनों में उतना ही अंतर है जितना मिठाई के चित्र और मिठाई के स्वाद में।
साधना करो - सही क्रम से। जिससे तुम्हारी बुद्धि जाग्रत हो, विवेक खुले, चेतना विस्तृत हो। जब चेतना जाग्रत होती है तो तुम इस संसार को, इस संसार के रचयिता को, उसकी लीलाओं को - अनुभव करने लगते हो। और तब एक अद्भुत बात होती है - तुम्हें बाहर कहीं खोजने नहीं जाना पड़ता। जो खोज रहे थे, वह अंदर ही था।
जो यहाँ पढ़ा - वह शास्त्रों और किताबों की खोज का सत्य है। जो ऋषियों ने जाना, जो आचार्यों ने समझाया - वह उनका सत्य था। तुम्हें अपना सत्य खोजना है। और वह सत्य किसी ग्रंथ में नहीं, किसी मंदिर में नहीं - तुम्हारी अपनी चेतना की गहराई में छुपा है।
उठो। साधना करो। संसार को पूरी तरह जियो। और उसी जीवन में - भगवती को खोजो।
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- आचार्य ऋतुराज दुबे
Way to Happiness - पराविज्ञान की पाठशाला,

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